हाई कोर्ट ने कहा- ग्रेच्युटी इनाम नहीं, कानूनी अधिकार:ग्रेच्युटी नहीं देने पर जीत समूह को लगाई फटकार, 25 हजार का लगाया जुर्माना

जोधपुर के जीत इंजीनियरिंग संस्थान द्वारा अपने ही कैंसर पीड़ित कर्मचारी और बाद में उनकी विधवा के खिलाफ बिना किसी आधार के लगातार केस चलाने के मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता संस्थान पर 25 हजार का जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही कैंसर पीड़ित कर्मचारी की विधवा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘जो कैंसर से पीड़ित थे, केस का निपटारा होने की उम्मीद में ही उनकी जान चली गई, जबकि संस्थान ने बिना किसी आधार के लगातार मुकदमा चलाया। कोर्ट ने कहा कि गंभीर रूप से बीमार कर्मचारी और अब उनकी विधवा पत्नी के खिलाफ अड़ियल रवैया करुणा की कमी को दर्शाता है, जो सामाजिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए विशेष रूप से बनाए गए एक शैक्षणिक संस्थान के लिए गंभीर है। एक शैक्षणिक संस्थान होने के नाते, न केवल याचिकाकर्ता से एक आदर्श नियोक्ता होने की उम्मीद की जाती है। दरअसल जोधपुर पाल रोड के प्रेम नगर निवासी राकेश कोठारी, जो रजिस्ट्रार के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। कोठारी की ओर से ग्रेच्युटी भुगतान नहीं होने पर संयुक्त श्रम आयुक्त के समक्ष अपील की। वहां से कोठारी के पक्ष में अर्द्ध न्यायिक आदेश जारी हुआ, जिसमें जोधपुर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी को ग्रेच्युटी का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। इसके खिलाफ संस्थान ने अपीलीय प्राधिकरण में अपील की, लेकिन प्राधिकरण ने संयुक्त श्रम आयुक्त के आदेश को बरकरार रखा। इसे चुनौती देते हुए संस्थान में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। इसी बीच राकेश कोठारी का टर्मिनल कैंसर से जूझते हुए निधन हो गया, लेकिन संस्थान की ओर से उनकी पत्नी संगीता कोठारी को भी पूर्ण भुगतान नहीं कर केस जारी रखा। इस मामले में संस्थान की ओर से कोर्ट में तर्क दिया गया कि नियंत्रक प्राधिकारी ने संस्थान या उनके वकील को सुने बिना ही 3 मार्च 2023 को आदेश पारित किया। साथ ही इससे पहले अपीलीय प्राधिकारी द्वारा 12 जुलाई 2022 को जारी आदेश भी बिना उचित विचार किए बरकरार रखा गया। एकपक्षीय आदेश लापरवाही, करतूत का परिणाम दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा कि – मामले के गुण दोष को देखने के बाद संस्थान द्वारा अपनाए गए रूख से कोर्ट सहमत नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पहली बार में याचिकाकर्ता की सुनवाई नियंत्रक प्राधिकारी द्वारा नहीं की गई होगी, लेकिन बाद में उसने अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष उक्त आदेश को चुनौती दी। अपीलीय प्राधिकारी ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद आदेश पारित किया। ग्रेच्युटी का भुगतान (1) किसी कर्मचारी को ग्रेच्युटी उसके रोजगार की समाप्ति पर देय होगी, जब उसने कम से कम पांच वर्ष तक लगातार सेवा की हो, (क) उसकी सेवानिवृत्ति पर, या (ख) उसकी सेवानिवृत्ति या त्यागपत्र पर, या (ग) दुर्घटना या बीमारी के कारण उसकी मृत्यु या अक्षमता पर: बशर्ते कि पांच वर्ष की निरंतर सेवा पूरी करना आवश्यक नहीं होगा, जहां किसी कर्मचारी के रोजगार की समाप्ति मृत्यु या अक्षमता के कारण हुई हो। संस्थान की याचिका तुच्छ और अवरोधक मुकदमेबाजी, जवाबदेही से बचने की मंशा कोर्ट के आदेश में लिखा कि – ग्रेच्युटी का दावा, जो सेवानिवृत्ति या मृत्यु पर अनिवार्य रूप से भुगतान करना होता है। याचिकाकर्ता के पास दावे के खिलाफ कोई ठोस बचाव नहीं है और यह याचिका कुछ और नहीं बल्कि तुच्छ और अवरोधक मुकदमेबाजी है। इस मामले को आगे बढ़ाना केवल याचिकाकर्ता की मृतक कर्मचारी और अब उसकी विधवा के साथ हुए अन्याय को रोकने की बजाय जवाबदेही से बचने की मंशा को दर्शाता है। जबकि, ग्रेच्युटी कोई इनाम नहीं बल्कि एक वैधानिक अधिकार है और इसके भुगतान में देरी अधिनियम का गंभीर उल्लंघन है।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *