कैलाश खेर का इंटरव्यू:कहा- 100 गाने तैयार हैं, जो दरवाजे पर खड़े हैं, कब हवा आए…दरवाजा खुले…हम बह जाएं हवा में

जोधपुर की नई पीढ़ी में आज भी संस्कारों की अखंड जोत जल रही है। यह इस शहर की विशेषता है। यहां भगवान की ऐसी कृपा है कि भले ही यहां लोग महल जैसे मकान बनाते हैं, लेकिन गोशाला भी बनती है। यहां भले 4 नई फैक्ट्रियां खड़ी हो जाएं, लेकिन ऐसा नहीं कि वो लोग लंदन में बस गए। दादाजी के संकल्प पूरा करने के लिए मंदिर भी बनाते हैं। जोधपुर की सूरत और सीरत के बारे में ये विचार प्रख्यात पार्श्वगायक एवं पद्मश्री कैलाश खेर ने व्यक्त किए। वे पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्री लक्ष्मीनारायण दवे के पाैत्रों के उपनयन संस्कार समारोह में हिस्सा लेने जोधपुर आए थे। उन्होंने मुंबई लौटने से पहले दैनिक भास्कर से विशेष बातचीत की। उन्होंने ‘महाकुंभ संगम’ से लेकर अपनी जीवनी, गाने व भारत के संस्कार के बारे भी बातचीत की। महाकुंभ संगम एलबम के बारे में बताएं, इसमें क्या खास है?
यह महाकुंभ संगम भगवान की एक ऐसी प्रेरणा है, जिसमें समय-समय पर भारत ही आपको ऐसे अवसर प्रदान करता है। यह महादेव की दुनिया है। भोले के भोले तो सब हैं, लेकिन भोलेपन व मूर्ख में बाल भर का ही फर्क होता है। हम मूर्ख आैर धूर्त ना हो जाएं…उससे बचना है। महाकुंभ से क्या संदेश जाता है पूरे विश्व भर में?
महाकुंभ में धनवान, मनवान या नामवान हो…भगत बनकर कुंभ में जा रहा है। अकड़ू बनने से नहीं चलेगा काम। भगवान व देवताओं के पास जा रहे हो, एक सेकंड में एक्सरे हो जाएगा। भारत के साथ पूरा विश्व लाभान्वित हो रहा है। वहां प्रार्थनाएं पूरे विश्व के लिए हो रही हैं…वसुधैव कुटंबकम…भारत ही एक ऐसी सभ्यता है। आपका शुरूआती जीवन कैसा रहा?
मैं पला हूं एक आश्रम में…गुरुकुल में पढ़ाई की…। पहले तो लगा ही नहीं, पलेंगे भी हम…। पहाड़ के कौनसे हिस्से से निकली शिला से भगवान की मूर्ति बनेगी। छैनी पड़ेगी, चोटें लगेगी, चिंगारियों से जलन होगी, वाे कोई नहीं देखता है। इस गढ़न व चलन के बाद परमात्मा पहचान दिलाता है, तो लगता है मारा तो खूब, लेकिन भगवान लाड़ भी कर रहे हैं। आपकी पहली किताब तेरी दीवानी लॉन्च हो रही है, क्या है इसमें?
मकसद बस इतना है कि चाहने वालों के निकट कैसे आया जाए। उनके हृदय में कैसे घुसा जाए। तेरी दीवानी, शब्दों के पार…पुस्तक आ रही है। 31 को जयपुर में लॉन्च होगी। आपके घर में टीवी नहीं, फिल्में भी नहीं देखते…यह कैसे संभव हो पाता है?
यदि आप स्वयं को देख लें तो आपको बाहर दिखने की जरूरत नहीं होती। ये सबके लिए नहीं, सभी का ध्यान लगा है, मेरा हटा है। यही डिटैचमेंट व अटैचमेंट है। सूर्यनगरी (जोधपुर) से आपका कैसा नाता है?
अपणायत व संस्कृति के संगम का शहर है। लोगों में संस्कार धीरे-धीरे परिवर्तित हो रहे हैं फैशन के साथ। पैशन फैशन में परिवर्तित हो रही है। लेकिन जोधपुर अभी भी संस्कार को पकड़े बैठा है।

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