नामांकन में 5 माह देरी, वोकेशनल के 6 कोर्सों में 10 से कम आवेदन

कभी झारखंड और आसपास के राज्यों के छात्रों की पहली पसंद माना जाने वाला रांची विश्वविद्यालय आज अपने ही बनाए संकट से जूझ रहा है। सत्र 2025-27 के लिए पीजी वोकेशनल और प्रोफेशनल कोर्सों में शुरू हुई नामांकन प्रक्रिया ने विश्वविद्यालय की अकादमिक और प्रशासनिक प्रणाली की गंभीर कमजोरियों को उजागर कर दिया है। हालात ये हैं कि एमबीए समेत 9 वोकेशनल कोर्सों में अभी तक 148 आवेदन आए हैं। जबकि एमबीए में 240 एडमिशन सीटें हैं। यानि एमबीए में जितनी सीटें हैं, उतने आवेदन सभी विषयों को मिलाकर भी नहीं आए हैं। आधा दर्जन से अधिक विषयों में 10 से कम आवेदन आए हैं। यह केवल घटती संख्या की कहानी नहीं है, यह गिरते भरोसे की कहानी है। यह उस संस्थागत ढांचे की कहानी है, जिसमें न समय पर रिजल्ट आते हैं, न समय पर एडमिशन होते हैं और न ही छात्रों को यह भरोसा मिलता है कि उनका अकादमिक भविष्य एक स्थिर प्रणाली के हाथ में है। वोकेशनल कोर्सों पर नजर रख रहे वरीय शिक्षक का कहना है कि जब तक समय पर रिजल्ट, तय समय पर एडमिशन और स्थिर अकादमिक कैलेंडर सुनिश्चित नहीं होंगे, तब तक हर साल यह संस्थान खुद ही अपने कैंपस को खाली करता रहेगा। यूजी रिजल्ट जारी नहीं होने से आवेदन की रफ्तार धीमी आवेदन की धीमी गति का 3 वजह 1. सेशन के अनुसार एडमिशन नहीं : देशभर के विश्वविद्यालयों में अगस्त महीने से नामांकन शुरू हो जाता है, लेकिन रांची विवि ने फॉर्म ही दिसंबर में जारी किए।
असर: रिजल्ट समय पर घोषित होता तो पीजी वोकेशनल कोर्सों में अधिक आवेदन आते। 2. एग्जाम सिस्टम की विफलता : स्नातक छठे सेमेस्टर का रिजल्ट समय पर प्रकाशित नहीं हुआ। हजारों छात्र पात्र होते हुए भी आवेदन नहीं कर सके। असर : तब तक छात्र कहीं और दाखिला ले लेते हैं या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हैं। 3. अकादमिक कैलेंडर का पालन नहीं : रिजल्ट, एडमिशन और सत्र प्रारंभ कब से होगा- तीनों की तारीखें स्पष्ट नहीं रहीं। बार-बार बदलाव ने छात्रों को परेशान कर दिया।
असर : योग्य उम्मीदवार आवेदन करने से वंचित हो गए। आरयू पर विश्वास टूट गया। विषयवार प्राप्त आवेदन

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