गृह विभाग खाका कर रहा तैयार:कानपुर और वाराणसी में जो कमिश्नरी सिस्टम फेल, उसी को रायपुर में लागू करने की तैयारी

छत्तीसगढ़ में पहली बार रायपुर में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम 23 जनवरी से लागू होने वाला है। इसे लेकर गृह विभाग खाका तैयार कर रहा है। मंत्री परिषद की बैठक के बाद जो रिपोर्ट सामने आई है, उसके अनुसार नगरीय निकाय क्षेत्र (22 शहरी थाने) में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू किया जाएगा। देहात के इलाकों (15 थानों) में अलग से ग्रामीण एसपी बिठाया जाएगा। यही सिस्टम उत्तर प्रदेश के कानपुर और वाराणसी (बनारस) में लागू किया गया था। एक ही जिले में दो तरह की पुलिस व्यवस्था से कई व्यवहारिक दिक्कतें और समन्वय की कमी सामने आई थी। इससे अपराध भी बढ़ने लगे थे। इसे देखते हुए यूपी सरकार ने एक साल बाद ही इसे वापस ले लिया और पूरे जिले में कमिश्नरी सिस्टम लागू कर दिया। अब इसी फेल सिस्टम को रायपुर में लागू करने की तैयारी है। चर्चा है कि मध्य प्रदेश में भी इस पर विचार किया जा रहा है, क्योंकि इसमें कई व्यवहारिक दिक्कतें हैं। जानिए, शहरी और देहात को अलग करने से ये दिक्कतें आएंगी 1. पुराने शहर से नवा रायपुर के बीच दो बार लगेगा कारकेड
अगर सिर्फ शहरी क्षेत्र में कमिश्नरी लागू की जाती है, तो इससे पुलिसिंग में दिक्कत आएगी। वीआईपी मूवमेंट के दौरान पुराने शहर से नवा रायपुर तक दो तरह की व्यवस्था लगानी पड़ेगी। निगम सीमा तक कमिश्नरी पुलिस के जवानों की ड्यूटी रहेगी। इसके आगे देहात पुलिस के अधिकारी अपने कारकेड में वीआईपी को ले जाएंगे। 2. एयरपोर्ट व विधानसभा की सुरक्षा देहात एसपी का जिम्मा
रायपुर में लागू होने वाले कमिश्नरी सिस्टम से एयरपोर्ट ग्रामीण एसपी के इलाके में आएगा। इसी तरह सिविल लाइन स्थित मुख्यमंत्री निवास, लोकभवन (राजभवन) और मंत्री बंगलों की सुरक्षा पुलिस कमिश्नर की जिम्मेदारी होगी। जबकि नवा रायपुर के मुख्यमंत्री निवास, मंत्री बंगले, लोकभवन, विधानसभा, मंत्रालय, सचिवालय की सुरक्षा ग्रामीण एसपी देखेंगे। 3. वारदात होने पर होगा सीमा विवाद हत्या, लूट, चोरी व डकैती जैसी वारदातों में सीमा विवाद की स्थिति निर्मित होगी। अगर घटना नगरीय निकाय और देहात की सीमा पर होती है, तो जांच को लेकर विवाद खड़ा हो सकता है। पड़ताल में भी दिक्कत आएगी। देहात के इलाके में जांच के लिए अनुमति लेनी होगी। ड्यूटी, ट्रांसफर-पोस्टिंग, क्वार्टर के आवंटन समेत कई काम शासन स्तर पर होंगे। इन पर कमिश्नर या एसपी स्तर पर फैसला नहीं हो पाएगा। भास्कर एक्सपर्ट – ओपी सिंह, रिटायर डीजीपी, यूपी कमिश्नर को मिले सख्त अधिकार
सालों के प्रयास के बाद 13 जनवरी 2020 को उत्तर प्रदेश में पहली बार लखनऊ में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू हुआ। इसके बाद मार्च 2021 में कानपुर और वाराणसी में इसे लागू किया गया। वहां नगरीय निकाय क्षेत्र में कमिश्नरी और देहात में एसपी सिस्टम लागू किया गया था। नवंबर 2022 में इस व्यवस्था को बदलकर पूरे जिले में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू कर दिया गया। इससे अपराध में काफी कमी आई और पुलिसिंग में सुधार हुआ। कमिश्नर के पास धारा 144 लागू करने, धारा 188 के तहत कार्रवाई करने, गन लाइसेंस, आबकारी से संबंधित कार्रवाई और जिला बदर जैसे अधिकार होते हैं। यह अधिकार रायपुर कमिश्नर को दिया जाना चाहिए। आईजी या एडीजी रैंक के अधिकारियों को कमिश्नर बनाया जाना चाहिए, क्योंकि उनके पास एसपी से अधिक अनुभव होता है। इससे फैसले लेने में आसानी होती है और सही निर्णय लिए जा सकते हैं। कमिश्नरी सिस्टम से अपराध पूरी तरह समाप्त नहीं होते, लेकिन उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। पुलिस को बार लाइसेंस जारी करने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए। भास्कर विचार – हर्ष पाण्डेय, स्थानीय संपादक एक शहर, दो पुलिसिंग… यह सुधार नहीं, प्रशासनिक उलझन है लगभग दो साल के इंतजार के बाद रायपुर में पुलिस कमिश्नरी लागू करने की घोषणा हुई है। पुलिसिंग के इस नए सिस्टम से सुधार का दावा किया जा रहा है, लेकिन भीतर से यह व्यवस्था एक दोहरी पुलिसिंग की स्कीम बनकर उभर रही है। एक जिला, एक शहर, फिर पुलिसिंग दो तरह की क्यों? यह सवाल सिर्फ प्रशासनिक नहीं, नागरिक अधिकारों और सुरक्षा की समानता से जुड़ा है। नई व्यवस्था में शहर अलग और देहात के थाने अलग। देहात सिर्फ देहात हों तब भी समझ आता। पिछले दो दशक से सरकार की ड्रीम सिटी बने ‘नवा रायपुर’ को भी देहात इलाके में माना जा रहा है। शहर के भीतर कमिश्नरी और शहर से बाहर एसपी सिस्टम, यह मॉडल कागज पर भले ही संतुलन लगे, जमीन पर यह भ्रम, असमानता और निश्चित रूप से जवाबदेही का संकट पैदा करेगा। अपराधी यह नहीं पूछता कि सीमा कमिश्नरी की है या देहात की। अपराध की प्रकृति एक है, तो पुलिसिंग की सोच दोहरी क्यों होनी चाहिए? नवा रायपुर, एयरपोर्ट, औद्योगिक कॉरिडोर और विस्तारशील कॉलोनियों को ‘देहात’ मानना वस्तुस्थिति से आंख मूंदने जैसा है। ये इलाके शहरी जीवन, हाईटेक इंफ्रास्ट्रक्चर और अंतरराष्ट्रीय आवागमन से जुड़े हैं। यहां की पुलिसिंग को देहात के ढांचे में रखना न सिर्फ अव्यावहारिक है, बल्कि शहर के भविष्य को पिछड़े फ्रेम में कैद करना है। एक ही शहर में पुलिसिंग के दो सिस्टम बनाने का मतलब है अलग अधिकार, अलग प्रक्रिया। आम नागरिकों के लिए भ्रम और अपराधी के लिए अवसर। यह व्यवस्था वन सिटी-वन कमांड के सिद्धांत के खिलाफ है। अगर राजधानी एक है, कलेक्टर एक हैं, तो पुलिसिंग भी एक होनी चाहिए। वरना पुलिस सुधार के नाम पर हम प्रशासनिक पैचवर्क खड़ा कर रहे हैं। ऐसे में यह सुधार नहीं, आधा-अधूरा प्रयोग साबित होगा।

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