भीलवाड़ा के मांडलगढ़ में शनिवार 18 जनवरी को भाई 25 बैलगाड़ियों से मायरे की रस्म निभाने पहुंचे। सजी धजी बैलगाड़ियां देख रास्ते से गुजर रहे लोगों ने मोबाइल में इस नजारे को कैद किया। कई जगह फूल बरसाकर स्वागत किया गया। मायरे में शामिल लोग ढोल-नगाड़ों की धुन पर नाचते चले। मामला मांडलगढ़ के खटवाड़ा गांव का है। जानकारी के अनुसार खटवाड़ा गांव निवासी 2 भाई भंवरलाल तेली और नंदलाल तेली शनिवार को अपनी बहनों के यहां मायरे की रस्म करने खटवाड़ा से जोजवा गांव बैलगाड़ियों से गए थे। जोजवा निवासी बहनोई कैलाश तेली किसान ग्रुप बोरवेल का काम करते हैं। बैलगाड़ियों से भंवरलाल और नंदलाल के साथ बड़ी संख्या में परिवार के लोग, रिश्तेदार, परिचित, ग्रामीण और दोस्त खटवाड़ा से जोजवा पहुंचे। इस दौरान बैलगाड़ियों को खींचने वाले बैलों का साज श्रृंगार किया गया। बैलों के गले में घुंघरू बांधे गए। परिजन व रिश्तेदार गाजे-बाजे के साथ नाचते-गाते बहन के घर मायरा भरने रवाना हुए। भंवरलाल तेली ने बताया- अपनी संस्कृति से जुड़े रहने के लिए परम्परागत बैलगाड़ियों में मायरा लेकर गए थे। हम दोनों भाई, हमारे परिवार, रिश्तेदार 25 बैलगाड़ियों से बहन के घर जोजवा पहुंचे और मायरा भरा। लग्जरी कारों की जगह सजी-धजी बैलगाड़ियों में मायरा भरने जाते वक्त राहगीरों ने जगह-जगह मोबाइल में तस्वीरें ली। उन्होंने बताया- राहगीरों ने बैलगाड़ियों के साथ सेल्फी भी ली। बैलों के गले में बंधे घुंघरू, गाजे बाजे और बैलगाड़ियों के पहियों की आवाज सुनकर लोगों ने कहा कि समाज में अपनी पुरानी संस्कृति से ही सामाजिक संस्कृति जीवित है। बैलगाड़ी में सवार सभी पुरुषों ने राजस्थानी पोशाक पहनी थी और साफा बांधा था। महिलाओं ने भी परंपरागत लिबास पहने थे। खटवाना और जोजवा गांव की गलियों से जब ये बैलगाड़ियां गुजरी तो लोगों की पुरानी यादें ताजा हो गई। जोजवा गांव में पहुंचने पर बहन के ससुराल वालों ने कुमकुम का टीका लगाकर स्वागत किया। जोजवा वासियों ने पुष्पवर्षा कर मायरा भरने आए लोगो का जोरदार स्वागत-सम्मान किया।


