हाईकोर्ट ने कहा:अनुसूचित क्षेत्रों को नगर पालिका में शामिल करना असंवैधानिक नहीं

हाईकोर्ट ने अनुसूचित क्षेत्रों को नगर पालिका अथवा नगर निगम की सीमा में शामिल किए जाने को लेकर दायर याचिकाओं पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित क्षेत्र संवैधानिक रूप से संरक्षित अवश्य हैं, लेकिन वे संवैधानिक रूप से जमे हुए नहीं हैं। कोर्ट अंकित कुमार व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि राज्यपाल द्वारा संविधान की पांचवीं अनुसूची के पैरा 5(1) के तहत कोई विशेष अधिसूचना जारी कर किसी कानून को अनुसूचित क्षेत्र में लागू न करने या उसमें संशोधन करने का निर्देश नहीं दिया गया है, तो राज्य द्वारा बनाया गया सामान्य कानून वहां लागू रहेगा। इसी आधार पर कोर्ट ने राजस्थान म्युनिसिपैलिटीज़ एक्ट, 2009 के तहत गांवों को नगर सीमा में शामिल करने की अधिसूचनाओं को वैध ठहराया। हालांकि कोर्ट ने केंद्र सरकार और संसद की भूमिका को लेकर गंभीर संवैधानिक चिंता भी व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243-जेडसी (3) के तहत संसद को अनुसूचित क्षेत्रों के लिए नगर पालिका व्यवस्था लागू करने का अधिकार है, लेकिन पिछले दो दशकों से म्युनिसिपैलिटीज़ (एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज़) बिल, 2001 अब तक कानून नहीं बन सका है। इससे एक संवैधानिक शून्य उत्पन्न हो गया है। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार स्वयं यह मान चुकी है कि कुछ अनुसूचित क्षेत्रों में शहरीकरण की सभी आवश्यक शर्तें पूरी हो चुकी हैं। इसके बावजूद संसद द्वारा आदिवासी हितों को ध्यान में रखकर कोई विशेष कानून नहीं बनाया गया। इस स्थिति में हाईकोर्ट ने एक हाइब्रिड गवर्नेंस मॉडल अपनाने का निर्देश दिया। इसके तहत शहरी सेवाएं जैसे सड़क, सफाई, कर, परिवहन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और निर्माण नियमन नगर पालिका कानून के तहत संचालित होंगे, जबकि भूमि अधिकार, आदिवासी कल्याण, संसाधन संरक्षण और सांस्कृतिक सुरक्षा से जुड़े संवैधानिक संरक्षण पूरी तरह लागू रहेंगे। पेसा (पेसा) के तहत कार्यरत आदिवासी संस्थाएं भी परामर्शात्मक भूमिका में बनी रहेंगी। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह इस निर्णय को केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालय तक पहुंचाए, ताकि संसद शीघ्र ही मेसा पर कानून बना सके। कोर्ट ने सभी याचिकाओं का निस्तारण करते हुए कहा कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन ही संविधान की मूल भावना है। एकीकरण हो, लेकिन आत्मसात नहीं, विकास हो, लेकिन विस्थापन नहीं।

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