एसआईआर पार्ट-2… दो दिन में सिर्फ 1005 को सुना गया:2003 में नाम था, फिर भी थमा दिए नोटिस, अब लगना पड़ रहा लाइन में

नो मैपिंग वाले वोटरों की सुनवाई 18 जगह हो रही है पर इसके बाद भी लाइन लग रही है। कारण दस्तावेज की जांच और बाकी की औपचारिकता में टाइम लग रहा है। हर वोटर का दस्तावेज लेते वक्त फोटो और हस्ताक्षर हो रहे हैं, इसलिए ऐसे कई लोग वापस जा रहे हैं जो एक साथ परिवार के सदस्यों के दस्तावेज लेकर पहुंच रहे हैं। जिन्हें बीएलओ ने नो मैपिंग कैटेगरी में डाला है, उनमें से कई वोटर 2003 एसआईआर की सूची साथ ला रहे हैं मतलब इन्हें जबरिया परेशान किया गया। कलेक्ट्रेट पहुंचे गिर्राज गुप्ता के परिवार में तीन सदस्य हैं। तीनों के नाम 2003 की लिस्ट में हैं। इसके बाद भी इन्हें नोटिस दिया गया। गिर्राज ने 2003 की सूची दी तो अफसरों ने पूछा कि फिर नोटिस क्यों मिला? उन्होंने कहा कि पता नहीं सर? गिर्राज अकेले पहुंचे थे पर उन्हें पत्नी और बच्चे को भी बुलाने के लिए कहा गया। लक्ष्मी की उम्र 45 साल है, परिवार के बाकी सदस्यों के नाम हैं पर नोटिस सिर्फ उन्हें मिला है। इनके पास पैन कार्ड है पर यह मान्य नहीं है, जो जानकारी उन्होंने मौखिक दी वह 2003 के रिकॉर्ड से मैच नहीं होने की बात स्टाफ ने उनसे कही। सुमित गुप्ता अपने साथ पत्नी के दस्तावेज लेकर भी पहुंचे तो उन्हें पत्नी बुलाने के लिए कहा गया। सुनवाई कर रहे अधिकारी अनिल राघव ने कहा कि सुनवाई के वक्त हर वोटर का आना जरूरी है। परेशानी से बचने इन दस्तावेजों को ले जाएं इधर बढ़ने लगी नए नाम वाले फार्म की पेंडेंसी पोलिंग बूथ पर अभी तक 7 हजार 162 फॉर्म जमा हुए हैं, इनमें नए नाम जोड़ने वाले 4 हजार 550 हैं। मंगलवार की स्थिति में इनमें से 4 हजार 395 पेंडिंग थे। यह संख्या अधिक होने से एक दिन पहले वीसी में सीईओ नाराज भी हुए। दूसरी तरफ स्थानीय अफसरों ने कहा कि क्या करें? नोटिस की सुनवाई से वक्त मिलेगा तभी तो इनका निराकरण होगा, बीएलओ भी व्यस्त हैं। अब तक 18 हजार 59 लोगों को मिल चुके नोटिस सुनवाई में पॉश कॉलोनियों से कम लोग पहुंच रहे अब तक 18 हजार 59 नोटिस वितरित हो चुके हैं पर सुनवाई सिर्फ 1005 की हुई है। पहले दिन यह संख्या सिर्फ 312 थी। सर्वाधिक भीड़ गरीब और घनी बस्तियों में रहने वाले लोगों की है। इनमें से अधिकतर किसी दूसरे जिले, प्रदेश से आकर बसे हैं। पॉश कॉलोनियों से बहुत कम लोग पहुंच रहे हैं। कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने कभी सरकारी दफ्तर नहीं देखा पर वे पूछते हुए कलेक्ट्रेट पहुंच रहे हैं।

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