लीगल रिपोर्टर| बिलासपुर हाई कोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक से जुड़े एक मामले में बिलासपुर के फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने ने कहा है कि भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10 ए में पति-पत्नी के दो वर्ष से अलग रहने की शर्त को पहले ही एक वर्ष तक किया जा चुका है और यह व्यवस्था पूरे देश में लागू है। बिलासपुर निवासी ईसाई युवक की शादी मंडला निवासी युवती के साथ 25 जून 2025 को बिलासपुर में हुई थी। विवाह के कुछ समय बाद ही आपसी मतभेदों के चलते एक माह बाद से ही वे जुलाई 2025 से अलग रहने लगे थे। दोनों ने 4 नवंबर 2025 को आपसी सहमति से तलाक का मामला बिलासपुर के फैमिली कोर्ट में प्रस्तुत किया। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया था कि धारा 10 ए के तहत तलाक के लिए पति-पत्नी का कम से कम दो वर्ष अलग रहना अनिवार्य है। इसे आदेश के खिलाफ दोनों ने हाई कोर्ट में अपील की थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान केरल हाईकोर्ट के सौम्या एन थॉमस विरुद्ध भारत सरकार के मामले का हवाला दिया, जिसमें धारा 10ए की दो वर्ष वाली शर्त को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के खिलाफ मानते हुए असंवैधानिक घोषित किया गया था। दंपती के अलग रहने की अवधि को घटाकर एक वर्ष कर दिया गया था। इस फैसले को कर्नाटक और बॉम्बे हाईकोर्ट भी अपना चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के कुसुम तामस्कर मामले के आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि संसद के कानून की संवैधानिक वैधता पर दिया गया फैसला पूरे देश में प्रभावी होता है। क्या है धारा 10 ए भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10 ए के तहत आपसी सहमति से तलाक का मामला प्रस्तुत किया जा सकता है। इस अधिनियम के नियमों के अधीन रहते हुए पति और पत्नी कोर्ट में तलाक के लिए अर्जी दे सकते हैं। वे इस आधार पर तलाक की मांग सकते हैं कि वे दो साल या उससे अधिक समय से अलग रह रहे हैं। वे अब साथ रहने में असमर्थ हैं और उन्होंने आपसी सहमति से यह विवाह को समाप्त करने का निर्णय लिया है।


