लुधियाना के शुभम बधवा ने 10 साल पहले हुए सड़क हादसे में दोनों पैर खो दिए थे और व्हीलचेयर पर आ गए। इसके बावजूद उन्होंने अपने सपने को नहीं छोड़ा और स्पोर्ट्स में सफलता हासिल की। हाल ही में उन्होंने मिस्र में आयोजित ITTF वर्ल्ड पैरा टेबल टेनिस चैलेंजर में सिल्वर मेडल जीतकर नया इतिहास रचा। इसके बाद उन्होंने 2 से 4 दिसंबर 2025 तक वडोदरा गुजरात में आयोजित UTT दूसरी नेशनल रैंकिंग टेबल टेनिस चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। शुभम बधवा का यह सफर 2016 में तब शुरू हुआ, जब 19 साल की उम्र में एक सड़क हादसे में उन्हें अपने पैर खोने पड़े। इससे पहले वे जिम्नास्टिक की प्रैक्टिस कर रहे थे और कई प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके थे। उनका सपना था कि वे जिम्नास्टिक में देश का प्रतिनिधित्व करें, लेकिन एक्सीडेंट ने उस रास्ते को रोक दिया। व्हीलचेयर पर आने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अंतरराष्ट्रीय पर भारत का नाम रोशन किया। अब उनकी नजर एशियन गेम्स पर है। उन्होंने कहा कि वे 3 साल बिस्तर पर रहे, फिर दोस्त ने नई राह दिखाई। जिसके बाद से सफर जारी है। फिटनेस को लेकर थे क्रेजी शुभम बधवा (29) लुधियाना के शाम नगर इलाके के रहने वाले हैं। LPU से B.Tech की डिग्री हासिल की। पढ़ाई में भी वे हमेशा अव्वल रहे। उनके पिता एक रिसॉर्ट में मैनेजर हैं और मां हाउस वाइफ हैं। शुभम बचपन से ही खेलों के शौकीन रहे हैं। 6वीं कक्षा से ही उन्हें जिम्नास्टिक का शौक था और 12वीं के बाद उन्होंने मॉडलिंग की दुनिया में भी कदम रखा था। वो फिटनेस को लेकर काफी क्रेजी थे। फिटनेस के प्रति उनका जुनून ऐसा था कि वे रोजाना जिम जाया करते थे। उनके सपने बड़े थे और जीवन में कुछ बड़ा करने का हौसला भी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। कुत्ते को बचाने में गंवा दीं दोनों टांगें 22 फरवरी 2016 की वह रात शुभम की जिंदगी बदलने वाली थी। शुभम हमेशा की तरह जिम से घर लौट रहे थे। शाम का वक्त था और कोचर मार्केट के पास से गुजर रहे थे, तभी अचानक सड़क पर एक कुत्ता सामने आ गया। शुभम ने उस मासूम जानवर को बचाने के लिए अपनी बाइक को तेजी से मोड़ा। लेकिन इस कोशिश में उनका संतुलन बिगड़ गया और एक्सीडेंट हो गया। हादसा के बाद शुभम को तुरंत दीप हॉस्पिटल ले जाया गया, लेकिन हालत देखकर वहां के डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया। फिर उन्हें DMC लुधियाना में शिफ्ट किया गया। पूरा महीना शुभम वेंटिलेटर पर रहे। जिंदगी और मौत के बीच जंग चल रही थी। लेकिन हादसे ने उन्हें पैरालिसिस दे दिया। रीढ़ की हड्डी को गंभीर चोट लगने से उनकी कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह से काम करना बंद कर गया। डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि अब शुभम को जिंदगी भर व्हीलचेयर पर ही रहना होगा। 3 साल बिस्तर पर, फिर दोस्तों ने दिखाई नई राह हादसे के बाद शुभम के अगले 3 साल बेहद मुश्किलों में बीते। पूरे 3 साल तक वे बिस्तर पर ही रहे। शरीर साथ नहीं दे रहा था। कभी सोचा भी नहीं था कि जो शुभम इतना एक्टिव था, वह आज दूसरों पर निर्भर हो जाएगा। लेकिन शुभम के मन में एक चिनगारी अभी भी जल रही थी। हार मानना उन्हें मंजूर नहीं था। इसी मुश्किल वक्त में शुभम के दोस्तों ने उनका साथ दिया। दोस्तों ने शुभम को बताया कि पैरा खेलों की दुनिया में बहुत संभावनाएं हैं। व्हीलचेयर पर रहकर भी टेबल टेनिस खेला जा सकता है। शुभम के लिए यह एक नई उम्मीद की किरण थी। उन्होंने फैसला किया कि वे फिर से अपनी जिंदगी को पटरी पर लाएंगे। इसके बाद शुभम ने साहिल शर्मा और विवेक शर्मा से पैरा टेबल टेनिस की कोचिंग लेनी शुरू की। व्हीलचेयर पर बैठकर पैडल पकड़ना बॉल को हिट करना शुरुआत में सब कुछ मुश्किल लग रहा था। लेकिन शुभम ने हार नहीं मानी। रोज घंटों प्रैक्टिस करते। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। पहली हार से लेकर नेशनल गोल्ड तक का सफर एशियन गेम्स में मेडल लाने पर नजर शुभम की उपलब्धियां यहीं नहीं रुकतीं। अब उनकी नजर इसी साल के एशियन गेम्स पर है। यह उनका सबसे बड़ा सपना है कि वे पैरालंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करें और मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करें। इसके लिए वे दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। हर दिन 6-7 घंटे की प्रैक्टिस, डाइट का खास ध्यान। शुभम बताते हैं कि पैरालिंपिक में पहुंचना और मेडल जीतना आसान नहीं होगा, लेकिन उन्हें अपने हौसलों पर पूरा भरोसा है। SAI की मदद से शुभम को अब बेहतरीन कोचिंग और सुविधाएं मिल रही हैं। वे नियमित रूप से अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट में हिस्सा ले रहे हैं। हर टूर्नामेंट से उनका अनुभव बढ़ रहा है। शुभम का कहना है मेरा सपना है कि मैं पैरालिंपिक में गोल्ड मेडल जीतूं। उन्होंने क कहा कि अगर मैं 2016 से आज तक आ सकता हूं, तो पैरालंपिक में भी मेडल जीत सकता हूं। परिवार का अटूट साथ जो बना सबसे बड़ी ताकत शुभम की कामयाबी के पीछे उनके परिवार का अटूट साथ रहा है। जब शुभम बिस्तर पर थे, तब उनकी मां ने उन्हें कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। पिता ने अपनी नौकरी के बावजूद शुभम की हर जरूरत का ध्यान रखा। बड़े भाई ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। पूरे परिवार ने मिलकर शुभम को दोबारा खड़ा किया। शुभम भावुक होकर कहते हैं कि अगर मेरे परिवार का सपोर्ट न होता तो शायद मैं आज यहां न होता। मां ने मुझे कभी हार मानने नहीं दिया। पिताजी ने हर मुश्किल में मेरा साथ दिया। मेरे भाई ने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया। मेरी हर उपलब्धि में मेरे परिवार का हाथ है। वे मेरी सबसे बड़ी ताकत हैं। जब मैं बैठकर कर सकता हूं, तो आप क्यों नहीं? युवाओं को संदेश देते हुए शुभम कहते हैं कभी हार मत मानो (Never Give Up) जिंदगी में मुश्किलें आएंगी लेकिन आपको खुद पर भरोसा रखना होगा। अगर मैं व्हीलचेयर पर बैठकर पूरी दुनिया में देश का नाम रोशन कर सकता हूं, तो भगवान ने आपको तो सब कुछ दिया है। आपके पास दो हाथ हैं दो पैर हैं आप कुछ भी कर सकते हैं। बस जरूरत है, तो सिर्फ मेहनत और लगन की। जब मैं बैठकर कर सकता हूं तो आप खड़े होकर क्यों नहीं कर सकते।


