पन्ना कलेक्ट्रेट परिसर गुरुवार को ग्रामीणों के भारी हुजूम और नारों से गूँज उठा। केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना से प्रभावित होने वाले आधा दर्जन से अधिक गाँवों के सैकड़ों ग्रामीणों ने अपनी मांगों को लेकर न केवल ज्ञापन सौंपा, बल्कि कलेक्ट्रेट के बाहर ही डेरा डालकर जमकर नारेबाजी की। ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन प्रशासन की “भेदभाव वाली नीति” और “जल्दबाजी” उनके भविष्य को अंधकार में धकेल रही है। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पड़ोसी जिले छतरपुर और पन्ना के लिए नियम अलग-अलग क्यों हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, छतरपुर में धारा 11 के प्रकाशन की तिथि बदलकर 16 फरवरी 2024 कर दी गई है, जबकि पन्ना में इसे 2022 पर ही अटका रखा गया है। इस तकनीकी पेंच के कारण पन्ना के सैकड़ों युवा ‘पुनर्वास पैकेज’ से वंचित हो रहे हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि पन्ना में भी तिथि बदली जाए ताकि पात्र बालक-बालिकाओं को उनका हक मिल सके। ग्रामीणों ने कलेक्टर को सौंपे पत्र में मानवीय आधार पर समय की मांग की है। उनकी मुख्य मांगों में मुआवजा वितरण के बाद घर बनाने के लिए कम से कम 6 माह का समय देना शामिल है। उन्होंने यह भी मांग की कि खेतों में रबी की फसल खड़ी है और बच्चों की परीक्षाएं सिर पर हैं, इसलिए जब तक कटाई और परीक्षाएं पूरी न हों, विस्थापन की कार्रवाई पर रोक लगाई जाए। इसके अतिरिक्त, वन अंचल और अशिक्षा के कारण कई युवाओं के पास सही जन्म प्रमाण पत्र नहीं हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि ऐसे युवाओं को उम्र के सत्यापन के लिए मेडिकल परीक्षण का मौका दिया जाए।


