नेपाली गर्ल के जाल में फंसा कॉलेज स्टूडेंट:पिता का बैंक अकाउंट खाली किया; एक ठेकेदार ने सुसाइड कर लिया, फिर भी ऑनलाइन गेम ऑन

तारीख 3 जनवरी 2026। ग्वालियर में एक 16 साल के नाबालिग ने अपने अपहरण की झूठी कहानी गढ़ी। जब पुलिस ने उसे पकड़ा तो खुलासा हुआ कि ऑनलाइन गेम और जुए की लत में फंसकर वो कर्ज में फंस गया था। इसी तरह करीब 20 दिन पहले भोपाल के ठेकेदार शिवान गुप्ता ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। पुलिस को घर की तलाशी के दौरान सुसाइड नोट मिला, जिसमें उसने लिखा कि उसने लोगों से उधार लेकर ऑनलाइन गेम एविएटर खेला था और सारी रकम हार गया था। पहले मामले में पुलिस ने नाबालिग के खिलाफ मामला दर्ज किया, वहीं दूसरे मामले में पुलिस ने एविएटर गेम को बंद करने के लिए गृह मंत्रालय को पत्र लिखा है। देश में ऑनलाइन गेम्स पर प्रतिबंध के दावों के बावजूद, ये कंपनियां धड़ल्ले से ऑपरेट कैसे हो रही हैं? इसे समझने के लिए भास्कर ने पड़ताल की, तो पता चला कि ज्यादातर गेम के सर्वर विदेशों से संचालित होते हैं। एप पर नेपाली और विदेशी लड़कियां 70 गुना पैसा कमाने का लालच देती हैं। आखिर इतनी मौतों के बाद भी ऑनलाइन गेम्स पर रोक क्यों नहीं लग पा रही है? ये जानने भास्कर ने एक्सपर्ट और अफसरों से बात की। पढ़िए रिपोर्ट,,, तीन केस- किसी ने पैसा गंवाया तो किसी ने जान केस-1: रिश्तेदार ने दिया धोखा
ये मामला भोपाल के रहने वाले रविंद्र पटेल के पिता के साथ हुआ। रविंद्र के एक रिश्तेदार ने उनके पिता के खाते से साढ़े तीन लाख रु. निकाल लिए। रविंद्र कहते हैं कि वह इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई कर रहा था। पिताजी उस पर भरोसा करते थे। सारे काम वो ही करता था। वह ऑनलाइन गेम खेलने लगा था। रविंद्र बताते हैं, “पिताजी आज भी की पैड वाला साधारण मोबाइल इस्तेमाल करते हैं, उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी कोई ऑनलाइन ट्रांजैक्शन नहीं किया। हमारे उस युवा रिश्तेदार ने इसी बात का फायदा उठाया।उसने पिताजी के मोबाइल पर OTP मंगाया, उसे देखा और तुरंत मैसेज डिलीट कर दिया। हमें पता भी नहीं चला और पिताजी का बैंक अकाउंट उस गेमिंग ऐप से जुड़ गया।” इसके बाद जो हुआ, वह किसी बुरे सपने से कम नहीं था। वह लड़का धीरे-धीरे पिताजी के खाते से सीधे रुपए ऑनलाइन गेम में लगाता रहा। जब पिताजी पासबुक प्रिंट कराने जाते, तो वह चालाकी से मशीन से पहले से प्रिंट किए हुए पन्ने पर ही एंट्री प्रिंट करा देता, जिससे बैलेंस का पता ही न चले। केस-2: 10वीं के स्टूडेंट कर्ज में फंसा
ये मामला ग्वालियर के माधौगंज थाने का है। ऑनलाइन गेम और जुए की लत में फंसकर 10वीं का छात्र लाखों के कर्ज में फंस गया। कर्ज चुकाने के लिए नाबालिग ने अपनी बुलेट बाइक तक गिरवी रख दी थी। परिजनों के डर से उसने खुद के अपहरण की झूठी कहानी गढ़ी, और दोस्त से अपने मोबाइल नंबर से परिजनों को फिरौती की कॉल करवाई। पुलिस ने महज 24 घंटे के भीतर नाबालिग को सुरक्षित बरामद कर लिया। पूछताछ में उसने बताया कि मुरैना में ऑनलाइन गेम खेलते हुए करीब 4 लाख रुपए हार गया था। परिजनों को कर्ज की जानकारी लगी तो उसे पढ़ाई के लिए ग्वालियर भेज दिया। शहर में वह रिश्तेदार के घर रहकर पढ़ने लगा। कुछ दिन तक सब ठीक चला, लेकिन इसके बाद छात्र फिर जुए की लत में पड़ गया। ग्वालियर में भी उसने करीब डेढ़ लाख रुपए ऑनलाइन जुए में गंवा दिए। परिजन ने 3 जनवरी को माधौगंज थाने में छात्र के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने 24 घंटे के भीतर नाबालिग को पकड़ ​लिया। पुलिस ने जब शहरभर के सीसीटीवी कैमरों की जांच की तो पाया कि अपहरण जैसा कुछ नहीं हुआ था। केस-3: भोपाल के ठेकेदार ने की खुदकुशी
ये मामला भोपाल का है जहां ​​​​​​32 साल के शिवान गुप्ता ने घर में फांसी लगा ली। शुक्रवार को घर की तलाशी के दौरान पुलिस को सुसाइड नोट मिला, जिसमें उसने लिखा कि उसने लोगों से उधार लेकर ऑनलाइन गेम खेला और सारी रकम हार गया। नुकसान के बाद लेनदारों के दबाव और मानसिक तनाव के चलते उसने यह कदम उठाया। परिजनों ने पुलिस को बताया कि तीन महीने पहले तक शिवान का कारोबार ठीक चल रहा था। वह घर निर्माण के ठेके लेता था और उसने कभी किसी परेशानी का जिक्र नहीं किया। परिवार उसकी शादी के लिए लड़की तलाश रहा था, लेकिन किसी को उसके ऑनलाइन गेमिंग की लत की जानकारी नहीं थी। क्यों नहीं लग पा रही गेमिंग साइट्स पर रोक?
साइबर एक्सपर्ट शोभित चतुर्वेदी इसके पीछे की तकनीकी जटिलताओं का खुलासा करते हैं। वह बताते हैं, ‘हमारे युवा जिन गेमिंग साइट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे सभी विदेशी सर्वर पर रजिस्टर्ड हैं। भारत में किसी भी वेबसाइट पर रोक लगाने की एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। जब तक सरकारी फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक पहुंचती हैं, ये गेमिंग रैकेट उसका तोड़ निकाल लेते हैं। ऐसे काम करती हैं ये वेबसाइट्स
चतुर्वेदी समझाते हैं, ‘हर वेबसाइट एक डोमेन नेम (जैसे google.com) और एक IP एड्रेस (नंबरों का एक समूह) पर चलती है। IP एड्रेस ही उसकी असली डिजिटल पहचान है। सरकार जब किसी साइट को बैन करती है, तो उसके डोमेन नेम और IP एड्रेस को ब्लॉक करती है। गेम से लेकर लाइव कैसीनो तक लालच का मायाजाल
ये प्लेटफॉर्म्स सिर्फ एक तरह के गेम तक सीमित नहीं हैं। ये लालच का एक पूरा बाजार चलाते हैं। AI तय करता है खेल, कंपनी हमेशा मुनाफे में
चतुर्वेदी कहते हैं कि खिलाड़ी को लगता है कि वह अपनी समझ और टाइमिंग से जीत रहा है, लेकिन सच तो यह है कि पूरा खेल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा नियंत्रित होता है। प्लेन कब क्रैश होगा, यह पहले से तय होता है। AI इस बात की गणना करता है कि कितने लोगों ने पैसा लगाया है और कितने निकाल रहे हैं। अफसर बोले- ये लगातार चलने वाली प्रक्रिया
साइबर क्राइम एसीपी सुजीत तिवारी का कहना है कि ऑनलाइन गेमिंग एप या तो ये वेबसाइट या लिंक के माध्यम से लोगों को जोड़ते हैं। जब भी ऐसे एप के जरिए साइबर फ्रॉड की शिकायत मिलती है तो कार्रवाई करते हैं। अगर वेबसाइट होती है तो उसे हम पीएस आईटी डिपार्टमेंट को लेटर लिखकर उसे बैन कराते हैं। वहीं लिंक, टेलिग्राम या वॉट्सएप होता है उसे भारत सरकार के सहयोग पोर्टल के जरिए कार्रवाई करते हैं। हमारी प्रक्रिया जारी रहती है। हम ये नहीं कह सकते कि ये पूरी तरह से बंद हो सकता है। लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। नशे की तरह दिमाग पर कब्जा करता है गेमिंग का ऐल्गोरिद्म
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी बताते हैं, ‘ऑनलाइन गेमिंग युवाओं को ठीक उसी तरह अपना लती बना रही है, जैसे कोई नशा करता है। इसकी शुरुआत मनोरंजन और छोटे-छोटे दांव से होती है, लेकिन यह कब एक विनाशकारी लत में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता। इन गेम्स का ऐल्गोरिद्म इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि शुरुआत में खेलने वाला अक्सर जीतता है। यह शुरुआती जीत दिमाग में डोपामाइन (खुशी का हार्मोन) का स्राव करती है, और यही एहसास उसे बार-बार खेलने के लिए प्रेरित करता है। यह जीतना एक नशे की तरह सिर चढ़ जाता है।” इसके बाद असली खेल शुरू होता है। “जब खिलाड़ी हारना शुरू करता है, तो वह सोचता है कि वह अब इस गेम में माहिर हो चुका है और अपनी हारी हुई रक़म जल्द ही वापस जीत लेगा।

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