मनरेगा का नाम बदले जाने के विरोध में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस बड़ा आंदोलन करने जा रही है। प्रदेश में कांग्रेस द्वारा 10 जनवरी से 25 फरवरी तक ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ चलाया जाएगा। इसकी रणनीति और कार्यक्रमों को अंतिम रूप देने के लिए गुरुवार को राजीव भवन में प्रदेश कांग्रेस प्रभारी सचिन पायलट ने पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी और जिला कांग्रेस अध्यक्षों की बैठक ली। इसमें छत्तीसगढ़ प्रभारी सचिन पायलट, प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, टी.एस. सिंहदेव सहित एआईसीसी के पदाधिकारी मौजूद रहे। पायलट ने कहा कि मनरेगा दुनिया का इकलौता कानून था जो रोजगार को संवैधानिक अधिकार देता था। भाजपा ने इसे कानून से योजना में बदलकर इसकी आत्मा खत्म कर दी। पहले 15 दिन में काम नहीं देने पर भत्ता देना पड़ता था, ग्राम पंचायतों को अधिकार था, केंद्र-राज्य हिस्सा 90:10 था जिसे अब 60:40 कर दिया गया है। इसका सीधा असर गरीब, भूमिहीन और ग्रामीण मजदूरों पर पड़ेगा। पीसीसी चीफ दीपक बैज ने कहा कि राज्य में काम बंद होने से करीब 7.5 लाख लोग रोज़गार की तलाश में असम, महाराष्ट्र, यूपी और कश्मीर तक पलायन कर गए हैं। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने कहा कि मनरेगा बचाओ आंदोलन आम आदमी और मजदूरों के अधिकार की लड़ाई है और इसे अंतिम परिणाम तक पहुंचाया जाएगा। वहीं टी.एस. सिंहदेव ने कहा कि कांग्रेस गांव-गांव जाकर बताएगी कि संशोधनों से गरीबों को कैसे नुकसान हो रहा है। बैज और महंत साथ दौरा करें बताया गया है कि पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी की बैठक के दौरान एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री ने पीसीसी चीफ दीपक बैज और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत को एक साथ प्रदेश का दौरा करने की बात कही। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं को एक साथ कार्यकर्ताओं और जनता के बीच जाना चाहिए ताकि कांग्रेस मजबूत हो सके। मनरेगा बचाओ संग्राम इस तरह चलेगा ग्रामीण इलाकों में पकड़ मजबूत बनाने कर रहे आंदोलन पंचायत से विधानसभा तक लगातार 45 दिन का आंदोलन पार्टी संगठन को फिर से एक्टिव करेगा और 2028 के चुनाव से पहले गांवों में खोई हुई पकड़ वापस लाने की कोशिश है, क्योंकि मनरेगा के तहत प्रदेश की ग्रामीण आबादी को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलती है। कांग्रेस इस आंदोलन के माध्यम से गांव के लोगों के बीच पहुंचकर लोगों का भरोसा जीतने की कोशिश करने जा रही है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां 60 फीसदी से ज्यादा आबादी ग्रामीण है, वहां मनरेगा का कमजोर होना सीधे वोट बैंक को प्रभावित करता है। कांग्रेस जानती है कि प्रदेश के ग्रामीण इलाकों के लोग धान खरीदी, बिजली बिल और बेरोजगारी से पहले ही नाराज हैं और मनरेगा इस गुस्से को संगठित आंदोलन में बदलने का सबसे मजबूत मुद्दा है। कांग्रेस इसे केवल मजदूरी का मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार छीने जाने की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है। इससे पार्टी यह नैरेटिव बनाना चाहती है कि मोदी सरकार राज्यों पर खर्च का बोझ डाल रही है, जबकि अधिकार खत्म कर रही है। यही कारण है कि आंदोलन को जिला, पंचायत और विधानसभा तक ले जाया जा रहा है।


