ऊंटों पर ‘अरावली और खेजड़ी बचाओ’ वाली हेयर कटिंग:30 साल पहले गर्दन पर फूल-पत्तियां बनाते थे, तैयार करने में लगते हैं 15 दिन

बीकानेर में आज से ऊंट महोत्सव शुरू हो गया है। 11 जनवरी तक चलने वाले इस फेस्टिवल में ऊंटों को अलग-अलग अंदाज में पेश किया जाएगा। इसमें सबसे खास है इन ऊंटों पर होने वाली फर कटिंग। ऊंटों पर होने वाली फर कटिंग करीब 30 साल पुरानी परंपरा है। इस बार 20 से ज्यादा ऊंट फर कटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेंगे। इस बार ऊंटों की फर कटिंग के माध्यम से पर्यावरण को बचाने का संदेश दिया जाएगा। इसमें सबसे खास अरावली और खेजड़ी बचाओ का मैसेज है। ऊंटों पर अमृता देवी के पूरे बलिदान को बताया गया है। ऊंटों पर होने वाली यह फर कटिंग इतनी आसान नहीं है। खास बात ये है कि ऊंटों पर फर कटिंग पूरे साल में केवल तीन महीने के लिए होती है। साल 1995 में पहली बार ऊंट फेस्टिवल में की गई थी फर कटिंग
बीकानेर में ऊंट उत्सव की शुरुआत साल 1995 में हुई थी। उसी साल बीकानेर के ऊंट को पर्यटकों के सामने प्रदर्शित करना था। सामान्य ऊंट को राजस्थानी रंग-बिरंगे कपड़ों से तो सजाया गया, लेकिन ऊंट के बढ़े हुए बाल इनकी सुंदरता को कम कर रहे थे। ऊंट पालक और फर कटिंग आर्टिस्ट रामलाल कूकणा ने बताया कि ऊंटों को सुंदर दिखाने के लिए 30 साल पहले पहली बार विदेशी सैलानियों के सामने इनके बाल काट कर प्रदर्शित किया गया था। इस दौरान उनकी गर्दन पर बालों को काट वहां पर फूल-पत्तियों की डिजाइन बनाई। इसके बाद इन पर अलग-अलग तरीके से फर कटिंग करने का सिलसिला शुरू हुआ। पहली बार बिग्गा रामसरा गांव के अमराराम नायक ने ऊंटों पर गहराई वाले चित्रों को उकेरा। जब उन्होंने फर कटिंग की कला को सभी के सामने प्रदर्शित किया तो हर कोई हैरान था। करीब पांच साल तक उन्हें ऊंट उत्सव में पहला स्थान मिला। रामलाल बताते हैं कि फर कटिंग की इस कला को उन्होंने अमराराम से सीखा था। रामलाल ने बताया कि साल 2021 में पहली बार वे फर कटिंग कर फेस्टिवल में ऊंटों को लेकर गए थे। इस फेस्टिवल में फर कटिंग का इनाम उन्होंने जीता। लगातार 2024 तक उन्होंने ये खिताब अपने नाम किया। रामलाल बताते हैं कि बीकानेर के कोलासर, बच्छासर, अक्कासर, रायसर समेत आस-पास के गांवों में फर कटिंग का काम होता है। वे बताते हैं कि बीकानेर के अलावा अजमेर के पशु मेले और जैसलमेर के मरु महोत्सव में भी ऊंटों की हेयर कट से डिजाइन तैयार किए जाते हैं। गांव में खेजड़ी काटा को बनाया अमृता देवी का चित्र, अरावली बचाने का संदेश
रामलाल ने बताया कि इस बार वे ऊंटों के माध्यम से पहाड़ों और पेड़ों को बचाने का संदेश देंगे। उन्होंने बताया कि उनके अक्कासर गांव में एक महीने पहले सोलर कंपनी ने खेजड़ी काट दी थी। इसे लेकर कंपनी और गांव के लोगों के बीच काफी विवाद हुआ था। ओरण में पांच से छह खेजड़ी के पेड़ थे, जिन्हें काट दिया था। इसी को लेकर काफी गुस्सा था। ऐसे में उन्होंने इस बार खेजड़ी बचाने के लिए ऊंट पर अमृता देवी के बलिदान को दिखाया है। इसके साथ ही इस बार अरावली बचाने का मुद्दा भी काफी गर्माया हुआ था। इसलिए उन्होंने ऊंटों पर अरावली के पहाड़ को बचाने का मैसेज दिया है। इसके अलावा कई ऊंटों के शरीर पर महाराजा गंगा सिंह का चित्र उकेरा गया है। इसके साथ ही गाय सहित अन्य पशुओं की आकृतियां बनाई गई हैं। फूल-पत्तियों से बनी आकर्षक बॉर्डर डिजाइन ऊंटों की सुंदरता को और निखार रही है। बीकानेर के रानी बाजार इंडस्ट्रियल एरिया में रहने वाले मोहम्मद कामिल ने अपने ऊंट पर विलुप्त हो रहे पशुओं के बारे में संदेश दिया है। उन्होंने बताया कि हिरण और बारहसिंगा आजकल नहीं दिखते। कम हो रहे इन बारहसिंगा को दिखाया गया है ताकि इनका संरक्षण हो सके। एक ऊंट को तैयार करने में लगते हैं 12 से 15 दिन
बीकानेर में हर वर्ष ऊंट उत्सव के दौरान फर कटिंग यानी बाल कटिंग प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इसमें 20 से 30 ऊंट हिस्सा लेते हैं। बीकानेर के आस-पास के गांवों के ऊंट पालक उत्सव से करीब 15 से 20 दिन पहले ही ऊंटों को सजाने की तैयारी शुरू कर देते हैं। एक ऊंट पर 25 हजार रुपए से ज्यादा का खर्च आता है। एक ऊंट पर पूरी डिजाइन तैयार करने में 12 से 15 दिन का समय लगता है। रोजाना थोड़े-थोड़े बाल काटकर डिजाइन बनाई जाती है। ऊंट पालक कैंची को इस तरह चलाते हैं कि ऊंट को कोई परेशानी न हो। ऊंट की चमड़ी मोटी होने के कारण उसे अधिक चुभन महसूस नहीं होती और वह शांत रहता है। खास बात ये है कि ऊंटों पर फर कटिंग केवल सर्दियों में होती है। गर्मियों में इनके नए बाल आने के साथ पसीना काफी आता है, इसलिए ये फर कटिंग केवल मार्च महीने तक होती है। तीन दिन ये इवेंट होंगे…

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