मध्यप्रदेश को देश का ‘ग्रीन हार्ट’ कहा जाता है। इसका वनावरण (फॉरेस्ट कवर) तो 77,073 वर्ग किमी है, जो देश में सबसे अधिक है। फिर भी यहां के शहरों में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। सीआरईए की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के 143 शहर ऐसे हैं, जहां 2019 से 2024 के बीच (कोविड वर्ष 2020 को छोड़कर) हर साल पीएम-2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से ऊपर रहा। यानी लगातार 5 साल से ये जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं। शहरों के लिहाज यह देश में चौथा राज्य है। सबसे चिंताजनक यह है कि इन 143 शहरों में से अधिकांश राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनकैप) के दायरे में नहीं हैं। यानी यहां कोई केंद्रित राष्ट्रीय एक्शन प्लान लागू ही नहीं है। हालांकि, सीआरईए का कहना है कि अब तक जारी एनकैप फंड का बड़ा हिस्सा सड़क धूल प्रबंधन और बुनियादी ढांचे पर खर्च हुआ है। प्रदूषण सिर्फ सर्दियों में नहीं बढ़़ रहा, अब यह सालभर की समस्या क्या वायु प्रदूषण सिर्फ दिल्ली की समस्या है?
– नहीं। सीआरईए की रिपोर्ट बताती है कि मध्यप्रदेश के कई शहर अब क्रॉनिक यानी लगातार प्रदूषित जोन में आ चुके हैं। यह समस्या मौसम की नहीं, पूरे साल की है। मप्र में हवा आखिर खराब क्यों हो रही है?
– सिंगरौली, सतना, कटनी, देवास जैसे इलाकों में कारखानों से लगातार धुआं निकलता है।
– सड़क, खनन और निर्माण काम में धूल नियंत्रण ठीक से नहीं होता, धूल हवा में बनी रहती है।
– भोपाल और छोटे शहरों में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन प्रदूषण जांच कमजोर है।
– रायसेन-सीहोर जैसे इलाकों में पराली जलती है, शहरों में कचरा। एनजीटी ने क्या सख्ती दिखाई?
– नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कई बार सरकार व नगर निगमों को फटकार लगाई। जांच समितियां बनीं, रिपोर्टें आईं, पर स्थायी समाधान अब तक जमीन पर नहीं दिखता। फिर कार्रवाई नाकाफी क्यों?
– क्योंकि कदम अक्सर सिर्फ सर्दियों तक सीमित रहते हैं, जैसे अलर्ट, प्रतिबंध और आदेश। रिपोर्ट साफ कहती है कि प्रदूषण साल भर चलने वाली समस्या है। अगर मप्र के शहर एनकैप में होते तो क्या फायदा होता?
एनकैप में शामिल शहरों को केंद्र सरकार गंभीर प्रदूषित मानती है। हर शहर के लिए अलग क्लीन एयर प्लान बनता। केंद्र से फंड मिलता। प्रदूषण घटाने के लक्ष्य तय होते। एनजीटी व केंद्र की निगरानी रहती।


