चांदी की आसमान छूती कीमतों ने एमपी के आदिवासी समुदाय को अपनी सदियों पुरानी परंपरा पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। जो चांदी कभी सम्मान और स्त्री-धन का प्रतीक हुआ करती थी, आज वही परिवारों के लिए एक आर्थिक बोझ बन गई है। इसी बोझ को कम करने के लिए रतलाम और अलीराजपुर समेत कई आदिवासी बहुल जिलों में एक बड़ा सामाजिक सुधार आंदोलन चल रहा है। जन-जागृति सम्मेलनों और बैठकों के बाद समाज ने सर्वसम्मति से फैसला किया है कि शादी-विवाह में दिए जाने वाले चांदी के आभूषणों की मात्रा को सीमित किया जाएगा। बता दें कि आदिवासी समुदाय में लड़की वालों को लड़के की तरफ से डेढ़ किलो चांदी देने की परंपरा है। ये चांदी लड़की के भविष्य के लिए दी जाती है। आखिर किस तरह से चांदी के दामों ने आदिवासियों की परंपरा को बदल दिया। पढ़िए रिपोर्ट… एकजुट समाज का फैसला
हाल ही में रतलाम जिले के सैलाना, बाजना और पिपलोदा क्षेत्रों में आयोजित आदिवासी जन-जागृति सम्मेलनों में यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया। भारत आदिवासी पार्टी के रतलाम जिला अध्यक्ष चंदू मईड़ा ने बताया कि समाज के प्रबुद्ध लोगों और युवाओं ने मिलकर यह तय किया है कि अब से विवाह में अधिकतम 1 किलो चांदी ही ली-दी जाएगी। इसके साथ ही, नकद राशि की मांग को भी न्यूनतम रखने पर सहमति बनी है। चंदू मईड़ा कहते हैं, ‘चांदी के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। 80 हजार से शुरू होकर यह 2 लाख रुपए किलो से ज्यादा तक पहुंच गई है। इससे गरीब परिवारों पर शादी का खर्च उठाना लगभग नामुमकिन हो गया था। इसी को देखते हुए हमने जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में बैठकें कीं और सभी की सहमति से यह निर्णय लिया। हमारा लक्ष्य विवाह को एक उत्सव बनाना है, सौदा नहीं। कर्ज का बोझ कम करने की पहल
इसी तरह का फैसला अलीराजपुर जिले में भी लिया गया है। यहां पहले शादी के समय वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष को स्त्री-धन के रूप में 1.5 किलो चांदी देने की परंपरा थी। लेकिन अब इसे घटाकर 1 किलो चांदी और 65,500 रुपए नकद कर दिया गया है। समाज के प्रतिनिधि शंकर तड़वाल इसकी एक बड़ी वजह गिनाते हैं। वे कहते हैं कि विशेषज्ञों का मानना है कि चांदी के दाम आने वाले समय में और बढ़ेंगे, ये थमने वाले नहीं हैं। जैसे-जैसे दाम बढ़ेगा, समाज पर आर्थिक बोझ भी बढ़ेगा। वहीं समाज के संजय रावत का कहना है कि कहीं न कहीं आदिवासी परिवार चांदी तो खरीद लेंगे मगर वो जमीन बेचेंगे या फिर कर्ज लेंगे। समाज ने पिछले कुछ सालों में महसूस किया है कि चांदी बेटियों को दिला तो देते हैं, लेकिन बाद में उन्हें प्रताड़ित किया जाता है कि उनकी वजह से लड़के पर कर्ज चढ़ गया। इसके लिए वो बेटियों को मेहनत मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों में भेजते हैं। क्या है ‘दहेज दापा’ की अनूठी परंपरा?
यह सामाजिक सुधार इसलिए भी खास है क्योंकि यह उस ‘दहेज दापा’ परंपरा में बदलाव ला रहा है, जो आम दहेज प्रथा के ठीक विपरीत है। आदिवासी मामलों के विशेषज्ञ केके त्रिवेदी बताते हैं कि मध्य प्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी, खरगोन, मंडला और डिंडोरी जैसे आदिवासी इलाकों में सदियों से वर पक्ष, वधू पक्ष को सम्मान स्वरूप ‘दापा’ देने की परंपरा रही है। त्रिवेदी समझाते हैं, ‘आदिवासी समाज मूल रूप से महिला प्रधान रहा है। यहां महिलाएं खेती-किसानी से लेकर घर चलाने तक, हर काम में पुरुषों के बराबर या उनसे ज्यादा योगदान देती हैं। पति अपनी पत्नी पर बहुत अधिक निर्भर रहते हैं। इसी श्रम, योगदान और सम्मान को मान्यता देने के लिए शादी के समय वर पक्ष की ओर से लड़की और उसके परिवार को चांदी के आभूषण और कुछ नकद राशि दी जाती है। यह स्त्री का अपना धन होता है। उन्होंने यह भी बताया कि सोने की जगह चांदी को इसलिए महत्व दिया गया क्योंकि यह सस्ती होती है और कम पैसों में अधिक मात्रा में आ जाती है, जिससे स्त्री-धन दिखने में भी भारी और सम्मानजनक लगता है। चांदी में तेजी के 5 प्रमुख कारण 2025 में सोना 75% और चांदी 167% महंगी हुई असली चांदी की पहचान करने के 4 तरीके


