9.53 करोड़ से संवरेगा हाथकरघा संस्थान, स्वदेशी परियोजना मंजूर

भास्कर न्यूज | जांजगीर जिले के लिए गर्व का विषय रहा भारतीय हाथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान, जांजगीर-चांपा अब नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है। लंबे समय से सीमित संसाधनों और पुराने बुनियादी ढांचे के कारण यह संस्थान अपने लक्ष्य अनुसार पूर्ण रूप से कार्य नहीं कर पा रहा था। यहां की कक्षाएं और प्रयोगशालाएं पुरानी तकनीक और उपकरणों पर निर्भर थीं, जिससे प्रशिक्षुओं को आधुनिक बाजार की मांग के अनुसार कौशल प्राप्त करना मुश्किल हो रहा था। परिस्थितियों ने लंबे समय तक संस्थान की संभावनाओं को रोक रखा था। हैंडलूम और हस्तशिल्प प्रशिक्षण का क्षेत्र व्यापक अवसर प्रदान करने वाला होने के बावजूद, स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर संस्थान की पहचान कमज़ोर पड़ गई थी। छत्तीसगढ़ शासन और जिला प्रशासन के सहयोग से तैयार की गई त्रिवर्षीय ‘स्वदेशी परियोजना’ को स्वीकृति मिल गई है। परियोजना की लागत 9.53 करोड़है, जिसे सीएसपीजीएल मड़वा, गेल इंडिया व जेएसडब्ल्यू एमपीसीएल नरियरा के सीएसआर फंड से प्रदान किया जाएगा। स्वदेशी परियोजना के तहत संस्थान में पूर्ण आधुनिकीकरण किया जाएगा। इसके अंतर्गत कक्षाओं और प्रयोगशालाओं में अत्याधुनिक उपकरण, स्मार्ट क्लासरूम, प्रोडक्शन- कम- डिजाइन सेंटर, छात्रावास और डिजिटल कैंपस सुविधाओं का विस्तार शामिल है। यह परिवर्तन संस्थान को देश के अग्रणी हथकरघा प्रशिक्षण केंद्रों में शामिल करेगा। पाठ्यक्रम में भी सुधार किया जाएगा। स्थानीय उद्योग की जरूरतों और बाजार की बदलती मांग के अनुसार प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार होंगे। छात्रों और कारीगरों को हैंडलूम, रंगाई, डिज़ाइन और विपणन जैसे क्षेत्रों में आधुनिक कौशल मिलेगा। विशेष रूप से हिंदी माध्यम में शिक्षण और अल्पकालिक मॉड्यूलर पाठ्यक्रम (3–6 माह) के माध्यम से प्रशिक्षण की पहुंच बढ़ाई जाएगी। चांपा की पहचान अपने पारंपरिक कोसा वस्त्र के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रही है। स्वदेशी परियोजना के माध्यम से कारीगरों को अत्याधुनिक तकनीक, डिज़ाइन कौशल और विपणन प्रशिक्षण मिलेगा। तीन वर्षों में 900 बुनकरों और कारीगरों, विशेष रूप से महिला उद्यमियों और युवाओं, को प्रशिक्षण दिया जाएगा। वोकल फॉर लोकल को मिलेगा बढ़ावा स्वदेशी परियोजना संस्थान को केवल तकनीकी और शैक्षणिक स्तर पर सशक्त नहीं करेगी, बल्कि जांजगीर-चांपा और आसपास के क्षेत्रों की पारंपरिक कला, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी पुनर्जीवित करेगी। संस्थान अब आधुनिक बुनाई, डिजाइन और विपणन तकनीकों से राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार होगा।

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