जयपुर के सिटी पैलेस के सर्वतोभद्र चौक में महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय के समय (1835-1880) की विभिन्न प्रकार की चरखियों के साथ तितली के आकार की एक बड़ी पतंग ‘तुक्कल’ भी प्रदर्शित की जा रही है। यहां आने वाले पर्यटकों के लिए यह पतंग और यहां डिस्प्ले चरखी आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है।
जानकारी के मुताबिक उस समय की विशेषता थी कि पूर्व राजा- महाराजा मखमल से बनी पतंगें और सूत से बने धागों से पतंगे उड़ाया करते थे। इसे आकर्षक बनाने के लिए इनमें सोने-चांदी के घुंघरू भी लगाई जाती थी। ये पतंगे जहां भी गिरती थीं, वहां से लाने के लिए घुड़सवारों को भेजा जाता था। जो भी घुड़सवार ये पतंग ढूंढ कर लाता था, उन्हें पुरस्कृत किया जाता था।
जयपुर की पतंगबाजी दुनियाभर में प्रसिद्ध
रियासत काल से ही जयपुर की पतंगबाजी देश-दुनिया में विख्यात है। इतिहासकारों के मुताबिक जयपुर में पतंगबाजी का इतिहास 150 वर्ष से अधिक पुराना है और इसका संबंध लखनऊ से है। इतिहासकार बताते है कि पूर्व महाराजा रामसिंह द्वितीय को पतंगबाजी का खूब शौक था। वे पतंग में चांदी के घुंघुरू बांधकर उड़ाते थे। कटी पतंग को लूटने वाले को इनाम देते थे। शाम को चांदपोल, गोविंदराव जी के रास्ते के नुक्कड़ पर भविष्य फल बताने के लिए ज्योतिषी जुटा करते थे।
फाइटर काइट है ‘तुक्कल’
‘तुक्कल’ पतंग एक विशेष प्रकार की फाइटर-काइट है, जो कि महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय के समय से बहुत ही लोकप्रिय है। सवाई राम सिंह द्वितीय बहुत ही कुशल पतंगबाज थे और उन्होंने 19 वीं सदी में ‘पतंग खाना’ के नाम से एक विभाग की शुरुआत भी की थी। जहां तरह-तरह की पतंगें बनाई जाती थी, देश -विदेश से लोग पतंग उड़ाना और बनाना सीखते थे। इसके बाद जयपुर शहर के लोगों को पतंगबाजी का इतना शौक चढ़ा कि शहर में जगह-जगह पतंग के कारखाने और दुकाने खुल गई थीं। उस समय पतंगों की विशेषता यह थी कि इन पतंगों को कपड़ों से और पतंगों को उड़ाने के लिए चर्खियों के धागे सूत से बनाए जाते थे। इन पतंगों को सजाने के लिए इन पर नाम भी लिखे जाते थे और ब्लॉक प्रिंट व डाई भी किया जाता था।


