झालावाड़ में भारतीय सनातन परंपरा का प्रमुख पर्व मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय वैदिक ज्योतिषी हेमंत कासट के अनुसार, सूर्य देव आज दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे, जिसके साथ ही उत्तरायण काल का शुभारंभ होगा। ज्योतिष शास्त्र में उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है। इस दौरान सूर्य की किरणें अधिक ऊर्जावान, स्वास्थ्यवर्धक और जीवनदायी होती हैं। सूर्य को आत्मबल, तेज, ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता का कारक ग्रह माना जाता है। मकर राशि में सूर्य का गोचर अनुशासन, स्वास्थ्य संतुलन और दीर्घायु को बढ़ावा देता है। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ के सेवन की परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक आधार भी है। तिल कैल्शियम का एक समृद्ध प्राकृतिक स्रोत है, जो सर्दियों में हड्डियों और जोड़ों को पोषण देता है। यह शरीर में ऊष्मा बनाए रखता है और स्नायु तंत्र को मजबूत करता है। आयुर्वेद में तिल को सर्वगुण संपन्न बताया गया है, जो विशेष रूप से सर्दियों में शरीर को बल और ऊर्जा प्रदान करता है। स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार, कैल्शियम के उचित अवशोषण और हड्डियों की मजबूती के लिए विटामिन डी आवश्यक है। इसका प्रमुख प्राकृतिक स्रोत सूर्य की किरणें हैं। शीत ऋतु में धूप कम मिलने के कारण विटामिन डी की कमी की आशंका बढ़ जाती है। इसी कारण मकर संक्रांति के आसपास सूर्य स्नान और खुले वातावरण में रहने की परंपरा विकसित हुई है। धूप में बैठना हड्डियों को मजबूत बनाने के साथ-साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने और खुले मैदानों में खेलकूद की परंपरा भी इसी वैज्ञानिक सोच से जुड़ी है। खुले आकाश में पतंग उड़ाने से शरीर को पर्याप्त धूप मिलती है, जिससे विटामिन डी का प्राकृतिक निर्माण होता है। इसके अलावा, शारीरिक गतिविधियों से रक्त संचार बेहतर होता है और यह आलस्य, अवसाद तथा मौसमी बीमारियों से बचाव में सहायक होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मकर संक्रांति ऐसा पर्व है जिसमें ज्योतिष, आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है और यह पर्व मानव को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर स्वस्थ और सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा देता है।


