टोंक में अरबी-फारसी शोध संस्थान में 18 जनवरी को सेमिनार:रिटायर्ड IAS जाकिर हुसैन होंगे चीफ गेस्ट; यहां सबसे बड़ी कुरआन

टोंक में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अरबी-फारसी शोध संस्थान के महत्व और हालात पर सेमिनार 18 जनवरी को होगी। वर्कशॉप में रिटायर्ड आईएएस जाकिर हुसैन चीफ गेस्ट होंगे। साथ ही प्रदेशभर से विषय विशेषज्ञ पहुंचेंगे। खास बात यह है कि इसी शोध संस्थान में आकार के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी कुरआन रखी हुई है। यहां दुनिया की सबसे बड़ी कुरआन वर्तमान हालात पर होगी चर्चा जानकारी के अनुसार- यह शोध संस्थान हाईवे के पास राज मिडवे पर है। शोध संस्थान की अहमियत एवं वर्तमान हालात विषय पर सेमिनार रविवार सुबह साढे 9 बजे होगी। कार्यक्रम में कई क्षेत्रों से आए प्रबुद्धजन मौजूद रहेंगे। सेमिनार में रिटायर्ड आईएएस अधिकारी जाकिर हुसैन मुख्य अतिथि होंगे। रिटायर्ड जज अयूब खान अध्यक्षता करेंगे। मौलवीं सईद साहब की संरक्षण में कार्यक्रम होगा। टोंक प्रोग्रेसिव कमेटी के संयोजक एवं संरक्षक सरताज अहमद एडवोकेट, सदर मुफ्ती आदिल नदवी, समाजसेवी राजेंद्र गोयल, सेठ मोइनुद्दीन निजाम, पूर्व सभापति अली अहमद, लक्ष्मी जैन, अशोक बैरवा भी मौजूद रहेंगे। संस्थान की ऐतिहासिक अहमियत मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अरबी-फारसी शोध संस्थान की निदेशालय के रूप में स्थापना वर्ष 1978 में राजस्थान सरकार द्वारा की गई थी। शुरू में इसे ‘निदेशालय अरबी फारसी शोध संस्थान’ के नाम से जाना जाता था, जिसे बाद में 1981 में भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के नाम पर समर्पित किया गया। संस्थान टोंक की पूर्व रियासत की समृद्ध तहजीबी विरासत का प्रतीक है। यहां मौजूद संग्रह में 8,000 से अधिक दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथ (मैनुस्क्रिप्ट्स), 27,000+ मुद्रित पुस्तकें, हजारों पुराने फरमान, दस्तावेज और भूतपूर्व रियासत टोंक के महकमा शरीअत के 65,000 से ज्यादा फैसले शामिल हैं। यहां दुनिया की सबसे बड़े साइज की कुरआन सहित ये संस्थान महाभारत, रामायण सहित कई अन्य धार्मिक एवं सामाजिक ग्रंथों के फारसी अनुवाद और मध्यकालीन इस्लामी साहित्य तक का अनमोल खजाना संजोए हुए हैं। 50 से अधिक देशों के शोधार्थी आ चुके देश-विदेश के 50 से अधिक देशों के शोधार्थी यहां आ चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति, प्रमुख विद्वान और कई वीवीआईपी इस संस्थान का दौरा कर चुके हैं। यह संस्थान अरबी, फारसी, उर्दू, इस्लामी अध्ययन, सूफीवाद, चिकित्सा, दर्शन और मध्यकालीन इतिहास के शोध के लिए विश्व प्रसिद्ध है। वर्तमान स्थिति और चुनौतियां-सुधार वर्तमान में संस्थान डिजिटाइजेशन के दौर से गुजर रहा है। हाल के वर्षों में 8,000+ दुर्लभ ग्रंथों का डिजिटलीकरण पूरा हो चुका है और वेबसाइट पर उपलब्ध है तथा कई होने वाले हैं। इससे दुनिया भर के शोधकर्ता ऑनलाइन इन ग्रंथों का अध्ययन कर सकेंगे। हालांकि कर्मचारियों की कमी एक चुनौती बनी हुई है 46 स्वीकृत पदों में से वर्तमान में केवल 8 स्थायी कर्मचारी है। बाकी सभी रिक्त चल रहे हैं। यहां पर शीघ्र भर्ती प्रक्रिया शुरू करने एवं यहां की महत्ता को देखते हुए इसे विकसित किए जाने के लिए टोंक प्रोग्रेसिव कमेटी अभियान के तहत कार्य कर रही है। गत माह मुख्यमंत्री सहित स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी यहां की स्थिति के सुधार के लिए अवगत कराया।

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