विदिशा के जैन मंदिरों में भगवान आदिनाथ स्वामी का निर्वाण महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर नगर के जैन मंदिरों को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू हो गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की और मंदिरों में मिष्ठान वितरण किया गया। हरिपुरा स्थित शीतलधाम में भगवान श्री आदिनाथ स्वामी का भव्य महामस्तकाभिषेक किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु शीतलधाम पहुंचे और धर्मलाभ लिया। निर्वाण महोत्सव के अवसर पर शीतलधाम को विशेष रूप से सजाया गया था, जिससे पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में नजर आया। शीतलधाम में बाल ब्रह्मचारी तरुण भैया के निर्देशन में बर्रो वाले बाबा आदिब्रह्मा भगवान आदिनाथ स्वामी की प्राचीन प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक हुआ। निर्यापक मुनि श्री संभव सागर महाराज के मुखारविंद से ऋद्धि मंत्रों के साथ वृहद शांतिधारा कराई गई तथा भगवान के सहस्त्रनामों का उच्चारण किया गया। इस दौरान 1008 कलशों से भगवान का अभिषेक किया गया और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजन-पाठ कर बड़े बाबा को निर्वाण लड्डू चढ़ाया। मुनि बोले- आदिनाथ ने मानव सभ्यता की नींव रखी
इस अवसर पर निर्यापक मुनि श्री संभव सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि भगवान ऋषभदेव की निर्वाण स्थली कैलाश पर्वत पर भले ही हम आज भौतिक रूप से न पहुंच पाएं, लेकिन अपने मन और भावों से वहां अवश्य पहुंच सकते हैं। उन्होंने बताया कि युग के आदि में हिमालय के विशाल प्रांगण में आदिनाथ भगवान 14 दिनों तक निरंतर योग निरोध में विराजमान रहे। पौष बदी 14 के दिन उन्होंने द्रव्यकर्म, भावकर्म सहित नौ कर्मों का नाश कर सिद्धत्व को प्राप्त किया। मुनि श्री ने कहा कि आत्मा से अंतरात्मा और फिर परमात्मा बनने की यह यात्रा आज भी हम सभी को आत्मबोध का मार्ग दिखाती है। उन्होंने बताया कि युग के आरंभ में जब आदिप्रभु का अवतरण हुआ, तब भोगभूमि की व्यवस्था समाप्ति की ओर थी और धर्म-कर्म का कोई स्वरूप नहीं था। ऐसे समय में भगवान आदिनाथ ने असि, मसी, कृषि, वाणिज्य और शिल्पकला का ज्ञान देकर मानवीय व्यवस्था को संभाला और मानव सभ्यता की नींव रखी। कहा- मानव जीवन को सही दिशा प्रदान की
उन्होंने कहा कि दीक्षा के बाद आदिप्रभु ने एक हजार वर्ष तक कठोर तपस्या की। केवलज्ञान की प्राप्ति के पश्चात उन्होंने धर्म का उपदेश दिया। धर्म, कर्म और मोक्ष के पुरुषार्थ के जनक आदिब्रह्मा भगवान आदिनाथ ही हैं, जिन्होंने मानव जीवन को सही दिशा प्रदान की। मुनि श्री ने अष्टापद कैलाश पर्वत का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भगवान के वे चरण आज भी विद्यमान हैं, जिन्हें इंद्र ने उकेरा था। सौधर्म इंद्र और भरत चक्रवर्ती ने जिस भाव से वहां निर्वाण कल्याणक मनाया था, उसी भाव से आज विदिशा के शीतलधाम में भगवान आदिनाथ का निर्वाण महोत्सव मनाया जा रहा है।


