भोपाल में महाभारत समागम का दूसरा दिन:पांचाली, दुशासन वध, उर्वशी और शिखंडी के मंचन ने बांधा समा

वीर भारत न्यास की ओर से आयोजित महाभारत समागम के दूसरे दिन महाभारत की कथाएं नृत्य-नाट्य की विविध शैलियों में सजीव हुईं। श्रीलंका और पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर से आए कलाकारों ने अपनी-अपनी परंपरागत विधाओं में महाभारत के प्रसंग प्रस्तुत कर दर्शकों को भारतीय सभ्यता की गहराई और विस्तार से रूबरू कराया। कार्यक्रम के बहिरंग मंच पर कोलंबो स्थित एके फोक आर्ट रिसर्च सेंटर की संगीत-नाट्य प्रस्तुति ‘पांचाली’ ने भावनाओं और वीरता का सशक्त संसार रचा। इससे पहले पूर्वरंग में कथकली शैली में ‘दुशासन वध’, मणिपुर से आई नृत्य नाटिका ‘उर्वशी’ और अंतरंग मंच पर दिल्ली के रंगकर्मियों द्वारा प्रस्तुत ‘शिखंडी’ का मंचन हुआ। पांचाली: भीम-हनुमान संवाद ने किया भावविभोर बहिरंग मंच पर प्रस्तुत ‘पांचाली’ में महाभारत का एक मार्मिक और प्रेरक प्रसंग दिखाया गया। कथा की शुरुआत बदरिकाश्रम से होती है, जहां द्रौपदी प्रकृति के सौंदर्य में डूबी हैं। एक दिव्य पुष्प उन्हें और पुष्प पाने की इच्छा से भर देता है। इस इच्छा की पूर्ति के लिए भीम वन की ओर निकलते हैं। घने जंगल में भीम का सामना हनुमान से होता है। बार-बार प्रयास के बावजूद जब भीम असफल होते हैं, तब उन्हें अपनी सीमाओं का बोध होता है। हनुमान स्वयं को भीम का भाई बताते हैं और भविष्य में अर्जुन के रथ पर विराजमान होकर साथ देने का वचन देते हैं। यह दृश्य दर्शकों के लिए गहरे भावनात्मक प्रभाव वाला रहा। आगे की कथा में भीम राक्षसों का संहार करते हैं, कुबेर से पुष्प तोड़ने की अनुमति मिलती है और अंततः पांडवों का पुनर्मिलन होता है। अर्जुन का इंद्रलोक से दिव्य अस्त्र-शस्त्र लेकर लौटना और भाइयों से मिलन पारिवारिक एकता और भावी युद्ध की तैयारी को प्रभावी ढंग से दर्शाता है। शिखंडी: पहचान और स्वीकार्यता की लड़ाई अंतरंग मंच पर प्रस्तुत नाटक ‘शिखंडी’ ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया। यह प्रस्तुति उस पात्र की आंतरिक लड़ाई को सामने लाती है, जिसे इतिहास ने लंबे समय तक हाशिये पर रखा। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में खड़ा शिखंडी केवल युद्ध नहीं लड़ रहा, बल्कि अपनी पहचान, मानवीय गरिमा और सामाजिक स्वीकार्यता की लड़ाई भी लड़ रहा है। समकालीन संदर्भों से जुड़ा यह नाटक अब तक देश-विदेश में 75 से अधिक बार मंचित हो चुका है। उर्वशी: अहंकार से विनम्रता तक की यात्रा मणिपुरी नृत्य नाटिका ‘उर्वशी गी नपाल’ में अहंकार के दुष्परिणामों को कोमल नृत्य और आध्यात्मिक भाव के साथ प्रस्तुत किया गया। नर-नारायण की तपस्या, उर्वशी की उत्पत्ति, उसके अहंकार और दुर्वासा के शाप तक की कथा दर्शकों को यह संदेश देती है कि सच्चा सौंदर्य विनम्रता में है। कथकली में दुशासन वध का तीव्र प्रभाव पूर्वरंग में कथकली नृत्य नाटिका ‘दुशासन वध’ ने धर्म और अधर्म के संघर्ष को तीव्रता से उकेरा। अर्जुन का मोह, कृष्ण का गीता उपदेश और विराट रूप दर्शन के बाद भीम-दुशासन का भीषण युद्ध नेत्राभिनय और सशक्त मुद्राओं के साथ प्रस्तुत किया गया। अंत में दुशासन वध के साथ द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध पूरा होता है। अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह की शुरुआत महाभारत समागम के अंतर्गत सभ्यताओं के संघर्ष पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का शुभारंभ हुआ। इस मौके पर विश्वप्रसिद्ध रंगमंच निर्देशक पीटर ब्रुक की चर्चित फिल्म ‘द महाभारत’ का प्रदर्शन किया गया। बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं और युवा फिल्म देखने पहुंचे।

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