श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता मिसाल है

दाढ़ी| ग्राम पंचायत लालपुर के आश्रित गांव मड़ई में 9 दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत ज्ञान महोत्सव का आयोजन किया गया है। जिसके आठवें दिन श्रद्धा और भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्रीधाम वृंदावन के कथा वाचक पंडित मदन मोहनदास ने सुदामा चरित्र की मार्मिक कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। कथा के दौरान पंडाल में उपस्थित अनेक श्रोताओं की आंखें नम हो गईं। कथा वाचक ने कहा कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता भारतीय संस्कृति में सच्चे संबंधों की सर्वोत्तम मिसाल है। यह कथा केवल एक राजा और एक निर्धन ब्राह्मण की नहीं, बल्कि निश्छल प्रेम, त्याग और आत्मीयता की अमर गाथा है। सच्ची मित्रता न तो धन देखते है, न पद और न ही प्रतिष्ठा, वह केवल हृदय की गहराइयों से जुड़ी होती है। बताया कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता गुरुकुल काल से प्रारंभ हुई थी। महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर दोनों ने साथ-साथ शिक्षा ग्रहण की। कठोर दिनचर्या, सीमित भोजन और अनुशासित जीवन के बीच उनकी मित्रता और अधिक प्रगाढ़ होती चली गई। गुरुकुल जीवन में जब भोजन की कमी होती, तब दोनों एक-दूसरे के साथ अपना अन्न साझा करते थे। इसी प्रसंग को सुनाते हुए कथा वाचक ने बताया कि जब सुदामा द्वारा लाए गए चने कृष्ण से छिपाकर खा लिए गए, तब भी श्रीकृष्ण ने हंसी में बात टाल दी। यही उनकी मित्रता की निश्छलता थी। कार्यक्रम में अनूप साहू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण कर रहे हैं।

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