सीवेज अपशिष्ट को 24 घंटे में चटकर खाद में बदल देंगे केंचुए

रोहट टाइगर बायो फिल्टर के लिए जगह का निरीक्षण करते अधिकारी। मुकेश दास | पाली रोहट में टाइगर बायो फिल्टर प्लांट स्थापित किया जाएगा, जिस पर 91 लाख रुपए खर्च होंगे। प्रदेश में 5 से 10 हजार आबादी वाले ऐसे 33 गांव चुने गए हैं। यहां केंचुए की विशेष प्रजातियों (टाइगर वर्म्स) की मदद लेकर बायोलॉजिकल प्रक्रिया सीवेज (सीवरेज की गंदगी) को ट्रीट किया जाएगा। केंचुए 24 घंटे में सीवेज को चटकर गंधहीन बनाते हुए वर्मी कम्पोस्ट (जैविक खाद) में बदल देंगे। रोहट का चयन इसलिए किया है क्योंकि यहां पहले से ही सीवरेज लाइनें बिछी हुई हैं, जो गुच्छी नाड़ी के पास से गुजरती हैं। इस प्लांट के लगने के बाद गांव का गंदा पानी सीधे फिल्टर प्लांट में डायवर्ट करेंगे। बता दें कि प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 84% घरों में सिंगल पिट शौचालय और 11% में सेप्टिक टैंक हैं। अब तक इन टैंकों के अपशिष्ट (मटमैला और गंदा पानी) के निस्तारण की कोई ठोस व्यवस्था नहीं थी। जिला परिषद पाली द्वारा तैयार नए प्रस्ताव इसी कमी को पूरा करेगा। जिला परिषद एसीईओ विशाल सिपा ने बताया कि जिला मुख्यालय के नजदीक होने से रोहट का का नाम प्रदेश मुख्यालय भेजा है। {टाइगर बायो फिल्टर: जल शुद्धीकरण प्रणाली है जो पानी को प्राकृतिक रूप से साफ करने के लिए बायो-फिल्टरिंग तकनीक का उपयोग करता है। इसमें आमतौर पर बायोलॉजिकल प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे कि सूक्ष्मजीवों, बैक्टीरिया और अन्य जैविक घटकों का प्रयोग करके प्रदूषित पानी साफ किया जाता है। {उपयोग: मानव अपशिष्ट और सेप्टिक टैंक के कीचड़ (फिकल स्लज) के प्रबंधन के लिए उपयोग ली जाती है। {कैसे काम करती है: ये तकनीक केंचुओं की विशेष प्रजातियों (जैसे टाइगर वर्म्स) पर आधारित है। ये केंचुए मानव अपशिष्ट को केवल 24 घंटों के भीतर खाकर उसे गंधहीन वर्मी कम्पोस्ट (खाद) में बदल देते हैं। इसमें न बिजली की जरूरत होती है और न ही किसी रसायन की। एक दिन में करीब 5 से 10 हजार लीटर के करीब गंदे पानी को शुद्ध कर सकता हैै।

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