कभी शान की सवारी था टमटम, अब केवल सामान ढुलाई में हो रहा उपयोग

गिरिडीह| एक समय था जब गिरिडीह शहर की सड़कों पर टांगों के घोड़ों की टापों की आवाज़ आम थी। शादी-ब्याह हो या बाजार जाना, स्टेशन से मोहल्लों तक सफर टांगो के बिना अधूरा माना जाता था। सजे-संवरे घोड़े, रंग-बिरंगे टमटम और उन्हें हांकते कोचवान गिरिडीह की एक अलग पहचान हुआ करते थे। सुबह-सुबह घोड़ों को नहलाना, उनकी देखभाल करना और फिर पूरे दिन सवारियों को ढोना—यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि एक परंपरा थी। कई परिवारों की रोजी-रोटी इन्हीं टमटमों से चलती थी। बच्चों के लिए घोड़ा कौतूहल का विषय होता और बुजुर्गों के लिए यह भरोसेमंद सवारी थी। समय बदला। साइकिल, ऑटो, फिर ई-रिक्शा और बाइक ने सड़कों पर जगह बना ली। टमटम धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया। घोड़ों की देखभाल महंगी होती गई और आमदनी घटती चली गई। आज हालात यह हैं कि शहर में गिने-चुने ही टमटम बचे हैं, जिसमें अब लकड़ी सहित अन्य सामग्रियों की ढुलाई का काम होता है।

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