निशान साहित्यिक मंच द्वारा कवि सम्मेलन मुशायरे का आयोजन किया गया। इसमें मंजर भोपाली, संपत सरल, सलीम सिद्दीकी सहित अन्य शायर और कवि शामिल हुए। शहर के एक निजी होटल में देर रात तक मुशायरा चला। इसमें बड़ी संख्या में श्रोता और दर्शक शामिल हुए। इससे पहले सभी कवि भगत सिंह लाइब्रेरी पहुंचे। यहां उन्होंने लाइब्रेरी में पढ़ने आए बच्चों से मुलाकात की। इसके अलावा भगत सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। मुशायरे में शामिल होने आए साहित्यकार संपत सरल से दैनिक भास्कर ने साहित्य, रचना और वर्तमान हालातों पर बातचीत की। पढ़िए, संपत सरल से दैनिक भास्कर की बातचीत… सवाल: समकालीन दौर में रचनात्मक साहित्य की स्थिति को आप कैसे देखते हैं? जवाब: पठन-पाठन और रचनाधर्मिता की संभावनाएं आज भी खत्म नहीं हुई हैं। हालांकि, लेखक और मंच पर प्रस्तुत करने वाले रचनाकारों की तैयारी उतनी मजबूत नहीं दिखती। अध्ययन, चिंतन और जीवन अनुभवों को शब्द देने की प्रक्रिया कमजोर हुई है। लोग पढ़ना-लिखना कम कर रहे हैं, लेकिन इसके लिए दर्शकों या श्रोताओं को उतना जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जितना लेखकों को। यदि लेखन में गहराई और तैयारी हो, तो अच्छे पाठक आज भी मौजूद हैं। सवाल: क्या आपको लगता है कि वर्तमान समय में दबाव और परिस्थितियां ऐसी हैं, जिनमें स्वतंत्र रूप से जनता की बात कहना कठिन हो गया है? जवाब: दबाव तो है, लेकिन असली परीक्षा दबाव में ही होती है। अच्छा काम हमेशा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में ही सामने आता है—चाहे वह लेखक हों या किसी भी क्षेत्र में काम करने वाले लोग। देश के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी हों या आपातकाल के दौर में संघर्ष करने वाले लोग, सभी ने दबाव में ही काम किया। इसलिए यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता कि हालात कठिन हैं। जो चाहे, वह अपनी कारीगरी और कौशल से रास्ता निकाल सकता है—और आज भी लोग ऐसा कर रहे हैं। सवाल: कवि सम्मेलन में श्रोताओं की संख्या लगातार कम हो रही है, वहीं सोशल मीडिया पर कवियों को सुनने वालों की संख्या लाखों में पहुंच रही है। ये विरोधाभास है या इसे आप कैसे देखते हैं? जवाब: मैं इसे एक तरह का विरोधाभास ही मानता हूं। जो व्यक्ति फेसबुक, यूट्यूब या इंस्टाग्राम पर कवियों को देख-सुन रहा है, वह कवि सम्मेलन या मुशायरों में क्यों नहीं जाता—यह सवाल अहम है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि पढ़ने-पढ़ाने के प्रति लोगों की उदासीनता बढ़ी है। शिक्षा पूरी तरह करियर-केंद्रित हो गई है। मानविकी विषयों और वैचारिक साहित्य की ओर रुझान पिछले 20–25 वर्षों में लगातार कम हुआ है। दूसरा कारण मौजूदा समय का सामाजिक माहौल है। आज का आदमी संवाद करना नहीं चाहता। वह अपनी बात कहना चाहता है, लेकिन दूसरों की बात सुनने को तैयार नहीं है। लाइव संवाद की गुंजाइश धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। हालांकि, अब स्थिति में बदलाव भी दिख रहा है। लोग सोशल मीडिया से उकता रहे हैं और दोबारा किताबों तथा मंचीय आयोजनों की ओर लौट रहे हैं। कवि सम्मेलन और मुशायरों में श्रोता फिर से आने लगे हैं। इसमें कवियों और शायरों की भी जिम्मेदारी है—अच्छा लिखना ही नहीं, उसे प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना भी जरूरी है। कई रचनाकार लिखते अच्छा हैं, लेकिन प्रस्तुति कमजोर होती है, जिससे श्रोता निराश हो जाता है। एक बार जो श्रोता लौट गया, उसे दोबारा मंच तक लाना आसान नहीं होता। सवाल: ज्ञानपीठ पुरस्कार साहित्य के नामचीन आदमियों को दिया जाता था। सत्ता के विरोध वालों को भी मिला। वर्तमान में ज्ञानपीठ पुरस्कार रामभद्राचार्य को दिया गया, जो मनुसंस्कृति की उपासना करते हैं, उसे जायज ठहराते हैं। इसे आप कैसे देखते हैं? जवाब: इसमें ऐसा है कि या तो चयनकर्ताओं पर किसी प्रकार का कोई दवाब रहा होगा, या फिर चयनकर्ता भी उसी विचारधारा के लोग होंगे। तो इस विषय में बेहतर है कि चयनकर्ताओं, देने वाली संस्थाओं से पूछा जाए। लेकिन, मेरा मत है कि किसी को अगर पुरस्कृत करना है तो उसका काम देखना चाहिए। समाज के लिए उसने क्या किया, धर्म, दर्शन, अध्यात्म, कला, संस्कृति जो इस देश की एक विरासत है, उसे लेकर वो आदमी क्या सोचता है, कितना लिखता है। क्योंकि पहले के जो राजनेता थे, वो अच्छे लेखक भी थे, लेखक नहीं तो बहुत अच्छे पाठक थे। अच्छे वैचारिक लोगों में उनका उठना बैठना होता था। कवि साहित्यकारों की संगत करते थे। अब आज के नेता लोग घिरे रहते हैं किसी रियल स्टेट वाले से, किसी सड़क के ठेकेदार से, किसी दारू के ठेकेदार से, तो वाल लोग इतना गहरा कहां से सोच पाएंगे। उनमें वैचारिकता का अभाव है। वो कोरे हैं, खाली हैं, वो खोखले हैं। वरना वो ये थोड़ी देखते की इसके विचार मुझ से नहीं मिलते, वो ये देखता है कि इसका काम समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण है। हमेशा ऐसा होता आया है कि कभी आम लोगों को अंधेरे से जागरूक करते हैं और उससे निकलने के लिए रौशनी दिखाते हैं। आज के दौर में ऐसा हो रहा क्या? देश और युवाओं के लिए कोई ऐसा रास्ता सुझा सकें। युवाओं का तो ये है कि तथ्यों की छानबीन करनी चाहिए। एक ही चीज पर भरोसा न करें। कवि साहित्यकारों पर भले ही दवाब न हो, पर कुछ तटस्थ हैं, कुछ सत्ता के साथ हैं। कुछ बोलना नहीं चाहते, कोई डर गया, घबरा गए। ये सब चीजें हैं। कुछ अपने आप ही आत्म अनुशासित होते जा रहे हैं कि अपन काहे को लफड़े में पड़ें। किसी को घर चलाना है, किसी को रोजी रोटी की चिंता है। कोई किसी और लालच या स्वार्थ में है। लेकिन फिर भी जो सच्चाई है, वो देर से ही सही, सामने आयेगी। लोग अच्छा सोचेंगे, लिखेंगे।


