आठ राज्यों की संस्कृति संजोए है राष्ट्रपति भवन का आमंत्रण-पत्र:कार्ड में प्रिंट सभी फोटो की है अलग-अलग कहानी, आईए जानते है क्या खास है इस कार्ड में

पाली के डॉ वैभव भंडारी को राष्ट्रपति भवन से आमंत्रण पत्र मिला है। यह आमंत्रण कई मायनों में खास है। कार्ड न सिर्फ अपनी भव्यता के लिए चर्चा में है, बल्कि इसमें देश की सांस्कृतिक विविधता को बेहद अनोखे अंदाज में दर्शाया गया है। इस आमंत्रण कार्ड में लगे प्रत्येक फोटो की अपनी अलग कहानी है। देश के करीब 8 राज्यों की संस्कृति को तस्वीरों के माध्यम से इस कार्ड में खूबसूरती से उकेरा गया है, जो भारत की एकता और विविधता का संदेश देता है। कार्ड देखने में भी बेहद लाजवाब और कलात्मक है।
आमंत्रण पत्र और बॉक्स में बांस आधारित हस्तशिल्प, त्रिपुरा की पारंपरिक बुनाई, हस्तनिर्मित काग़ज़, अष्टकोणीय बांस बुनाई से बनी वॉल हैंगिंग स्क्रोल, तथा सिक्किम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, नागालैंड, मिज़ोरम और मणिपुर की विशिष्ट हस्तकलाओं को दर्शाया गया है।
आइए जानते है कि इस कार्ड में कौनसी तस्वीर क्या कहानी कहती है। पाली से डॉ वैभव भंडारी 26 जनवरी को दिल्ली में लेंगे हिस्सा
बता दे कि दिव्यांगों के हितों के लिए पिछले कई सालों से काम करने वाले पाली शहर के आदर्श नगर निवासी डॉ वैभव भंडारी को राष्ट्रपति भवन से आमंत्रण मिला है। वे 26 जनवरी को दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले एट होम स्वागत समारोह में हिस्सा लेंगे। जिसमें देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी आएंगे। निमंत्रण कवर और बॉक्स
निमंत्रण बॉक्स में बॉस की बुनी हुई चटाई का उपयोग किया गया है, जो करघे पर तैयार की गई है। इसके ताने (वार्प) में रंगे हुए सूती धागे और बाने (वेफ़्ट) में बाँस की बारीक पट्टियां इस्तेमाल की गई हैं। यह तकनीक त्रिपुरा राज्य में प्रचलित है। बाहरी कवर पर हाथ से बने कागज के टैग पर आपका पता लिखा है जो बाँस से बनी एक कलाकृति के साथ लगाया गया है। यह कलाकृति बाँस को विशेष तरीके से धुएँ में तपाकर बनाई गई है। इस प्रक्रिया से इस कलाकृति का रंग गहरा भूरा हो जाता है। दीवार की सजावट हेतु स्क्रोल
बॉस की अष्टकोणीय बुनाई पैटर्न वाली यह स्क्रोल, खुलने पर, भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के प्रत्येक राज्य की हस्तनिर्मित कृतियों का एक कलात्मक प्रदर्शन प्रस्तुत करती है। स्क्रोल की संरचना और तीन रंगों के धागे, कमर-करघे (लॉइन-लूम) के आकार का भी आभास कराते हैं। कमर-करघा बुनाई का एक उपकरण है, जिसका उपयोग भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में, विशेषकर महिलाओं द्वारा, विभिन्न प्रकार के कपड़े बुनने के लिए किया जाता है। बिच्छू बूटी से बुना कपड़ा और कढ़ाई, सिक्किम
सिक्किम की विशिष्ट लेपचा बुनाई या ‘थारा’, परंपरागत रूप से बिच्छू घास (सिसनु) के रेशों से की जाती है। आधुनिक लेपचा बुनाई में बिच्छू घास के साथ सूती और ऊनी धागों का भी उपयोग होता है, जिन्हें कमर-करघे पर बुना जाता है। लेपचा लोक कथा के अनुसार, इस समुदाय का उद्भव कंचनजंघा पर्वत के निर्मल हिम से हुआ था। पर्वतों के साथ उनके पूर्वजों के इस विशेष संबंध, तथा भारत की पहली UNESCO ‘मिक्स्ड हेरिटेज साइट’, ‘कंचनजंघा राष्ट्रीय उद्यान’ के प्रति, इस कढ़ाई द्वारा सम्मान व्यक्त किया गया है। रित बॉस कला बुनाई, मेघालय
मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स क्षेत्र में स्थित मौसिनराम पृथ्वी पर सबसे अधिक वर्षा के लिए तो प्रसिद्ध है ही, यहां की बॉस की बुनाई की परंपरा भी अत्यंत विकसित है। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले कच्चे बांस में प्राकृतिक रूप से जलरोधी रेशे होते हैं, जिनमें हल्की हरी चमक बनी रहती है जो अन्य बाँस प्रजातियों से अलग है। स्क्रोल पर हरे बॉस का कोस्टर, यहाँ सामान्य रूप से उपयोग होने वाली वर्षा-ढाल या ‘नुप’ से प्रेरित है। इसमें बारीक बाँस की दो परतों को षट्कोणीय बुनाई में पिरोया जाता है, जिनके बीच ताड़ के पत्तों की एक परत रखी जाती है। इस तरह, भारी वर्षा से सुरक्षा देने वाला हल्का और टिकाऊ आवरण तैयार होता है। मोन शुगु कागज, अरुणाचल प्रदेश
अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कमेंग जिले में, मोनपा लोग जंगलों में शुगु शेंग झाड़ी की भीतरी छाल इकट्ठा करने जाते हैं। छाल को उबालकर गूंथा जाता है और पल्प में तब्दील किया जाता है, फिर इसे पतला किया जाता है। इस मिश्रण को फ्रेम में डाला जाता है, और सूखने के लिए रखा जाता है, जिससे कागज की परतें बनती हैं। यह कागज बहुत मजबूत होता है, और आसानी से फटता नहीं है। मोन शुगु हस्तनिर्मित कागज का उपयोग ग्रंथों के लेखन, और रोजमर्रा के कार्यों के लिए किया जाता है। स्क्रोल पर, इस बहु प्रयोगी कागज को अरुणाचल प्रदेश के राज्य-पशु ‘मिथुन’ के विशेष आकार में ढाला गया है। गोगना –बॉस से बना वाद्य यंत्र, असम असम में रोंगाली बिहू (नववर्ष) का स्वागत गोगना की मधुर धुनों के साथ किया जाता है, जिसके साथ ढोल और पेपा भी बजाय जाते हैं। बाँस से बनी यह जॉ-हार्प इन उत्सवों का अभिन्न अंग है। इस वाद्य यंत्र की बनावट वादक के अनुसार कुछ परिवर्तित होती है। पुरुषों की रामधन गोगना छोटी, चौड़ी और भारी होती है; जबकि महिलाओं की लाहोरी गोगना लंबी और पतली होती है, जिसे वे नृत्य के दौरान कभी-कभी बालों में हेयर पिन की तरह लगाती हैं। स्क्रोल में प्रदर्शित बच्चों की गोगना छोटी और हल्की होती है, तथा बजाने में सबसे सरल बॉस और बेंत का आभूषण, त्रिपुरा
त्रिपुरा में कुशल जनजातीय शिल्पकार बाँस और बेंत की बारीक पट्टियों से उत्कृष्ट आभूषण और सजावटी वस्तुएँ बनाते हैं। इन प्राकृतिक सामग्रियों को आकार देकर और बुनकर हल्के, टिकाऊ तथा आकर्षक रूपों में ढाला जाता है। ये सुंदर वस्तुएँ सरल उपकरणों और चिपकने वाले प्राकृतिक पदार्थों से बनाई जाती हैं। ये शिल्पकारों की कल्पना, दक्षता और कौशल को दर्शाती हैं। ऑरेंज वाइल्ड रिया और बिच्छू घास का कपड़े, नगालैंड
नगालैंड की खियामनियुंगन नागा जनजाति द्वारा पहने जाने वाले इस वस्त्र के पीछे धीरे-धीरे विलुप्त होती परंपराओं के पुनर्निर्माण की एक गहरी कहानी है। स्थानीय महिलाएं ऑरेंज वाइल्ड रिया पौधे और बिच्छू घास (जिसे वहाँ ‘एहलोन निउ’ कहा जाता है) के तनों से प्राप्त रेशों से यह दुर्लभ वस्त्र बनाती हैं। रेशों को जंगलों से इकट्ठा किया जाता है, हाथ से बारीक धागों में अलग किया जाता है, सूत में काता जाता है और हाथ से बुना जाता है। चुनौतियों के बीच जन्मी यह कला, अब परंपराओं और गौरव का प्रतीक बन गई है। स्क्रॉल पर प्रदर्शित नमूना जॉब्स टीयर्स (गवेधुका या एडले मिलेट) पौधे के दानों से सजाया गया है, जिनका उपयोग इस क्षेत्र में आभूषण बनाने के लिए किया जाता है। हाथ से बुना पुआन चेई, मिज़ोरम
पुआन चेई एक शॉल अथवा घेरदार स्कर्ट है, जो मिज़ोरम में लोकप्रिय है। ‘पुआन’ शब्द का प्रयोग, मिज़ो लोगों के परिधान या कपड़ों के लिए किया जाता है; ‘पुआन’ से जुड़े उपसर्ग या प्रत्यय से उसके उपयोग की जानकारी मिलती है। ‘चेई’ का अर्थ है ‘सजाना’। इसलिए, ‘पुआन चेई’ उन सजीले परिधानों को कहा जाता है जिन्हें महिलाएं त्योहारों और शादियों जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर पहनती हैं। कपास के बने ये परिधान कमर-करघों पर बुने जाते हैं, और उनमें बारीक डिज़ाइन होती है। काली मिट्टी का लोंगपी शिल्प, मणिपुर
बर्तन बनाने की इस प्राचीन तकनीक का उपयोग मणिपुर के तांगखुल नागा समुदाय द्वारा नवपाषाण काल से किया जा रहा है। लोंगपी पहाड़ियों के काले सर्पेन्टाइन पत्थरों के चूर्ण को स्थानीय मिट्टी के साथ मिलाकर बनाया जाना, इन बर्तनों की विशेषता है। इन्हें हाथ से आकार दिया जाता है, भट्टी में तपाया जाता है, और फिर पत्तियों से पॉलिश किया जाता है, जिससे इन्हें प्राकृतिक चमक प्राप्त होती है। स्क्रोल पर लगाई गई काली मिट्टी की कलाकृति, मणिपुर के राज्य-पुष्प ‘शिरुई लिली’ को दर्शाती है। जाने कौन हैं डॉक्टर वैभव भंडारी
डॉ वैभव भंडारी पाली के आदर्श नगर में रहते है। पेश से एडवोकेट है और पिछले कई सालों से दिव्यांगों के हितों को लेकर काम कर रहे है। पिता चंद्रभान भंडारी व्यवसायी है और माता शशि भंडारी गृहिणी है। उन्होंने PHD (कानून), MA (मनो विज्ञान), प्रोफेशनल डिप्लोमा इन क्लिनिकल साइकोलॉजी (RCI), MSW, LML, LLB, B.com त की पढ़ाई की है। उनका स्वावलंबन फाउंडेशन आज देश के 25 से अधिक राज्यों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।
डॉ. भंडारी के प्रयासों से पाली में बौद्धिक दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष केंद्र की स्थापना हुई। अब तक 47,534 से अधिक दिव्यांग जन एवं दुर्लभ रोगी लाभान्वित
जेनेटिक टेस्टिंग, सरकारी योजनाओं, कानूनी सहायता और पुनर्वास सेवाओं से जोड़ा।
डॉ. वैभव भंडारी के प्रयासों से कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लागू हुए, जिनमें प्रमुख हैं
– प्रदेश के सभी कॉलेजों में अनिवार्य व्हीलचेयर सुविधा
– राजस्थान में मोटर व्हीकल एक्ट में संशोधन कर दिव्यांग अनुकूल परिवहन
– रोडवेज में बुकिंग काउंटर से सीधी सीट आवंटन व्यवस्था
– सिलिकोसिस मरीजों के लिए प्रत्येक जिले में मासिक शिविर
– “दिव्यांग ” शब्द के स्थान पर “दिव्यांग” शब्द का सरकारी प्रयोग सहकारिता विभाग से आदेश संस्थाओं हेतु ।
– बौद्धिक दिव्यांगजनों को मतदान प्रक्रिया में शामिल करने हेतु विशेष निर्देश
– ‘इंक्लूसिफिट’ कार्यक्रम के माध्यम से फैशन डिजाइन विद्यार्थियों के साथ मिलकर उन्होंने प्रगतिशील दिव्यांगता, व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं और अधिक सहारे की आवश्यकता वाले व्यक्तियों के लिए सुलभ, आरामदायक और गरिमापूर्ण कपड़े विकसित किए।
– दिव्यांग बाल मेला को एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज।
– मस्कुलर डिस्ट्रॉफी प्रभावित व्यक्तियों के लिए विशेष हल्की इलेक्ट्रिक व्हीलचेयर पर राष्ट्रीय स्तर का आदेश।
– राजस्थान के पहले व्यक्ति जिन्होंने इच्छा मृत्यु पर Living Will बनाई। पुरस्कार और सम्मान
– राष्ट्रीय पुरस्कार 2022 — राष्ट्रपति द्वारा ‘सर्वश्रेष्ठ दिव्यांगजन’
– हेलेन केलर अवार्ड 2023 — NCPEDP
– प्रो. यशवंतराव केलकर राष्ट्रीय युवा पुरस्कार 2023
– Rare Star Award 2024 सहित अनेक राज्य व जिला स्तरीय सम्मान

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