रांची शहर से 40 किलोमीटर दूर अनगड़ा प्रखंड के घने जंगलों के बीच बसा धुरलेटा गांव आज झारखंड में एक आदर्श और आत्मनिर्भर गांव के रूप में पहचान बना रहा है। महज 23 परिवारों वाले इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां से पलायन पूरी तरह खत्म हो चुका है। राजाडेरा पंचायत के पूर्व मुखिया मोतीराम मुंडा ने कहा कि नाबार्ड और रामकृष्ण मिशन के सहयोग से गांव के करीब 100 एकड़ क्षेत्र में जैविक खेती की जा रही है। खेती और पशुपालन से कई परिवारों की सालाना आय 8 लाख रुपए तक पहुंच गई है। कभी पथरीली और बंजर रही पहाड़ी जमीन को ग्रामीणों ने मेहनत से उपजाऊ बनाया है। खेतों में बीजामृत और जीवामृत का इस्तेमाल होता है। गोबर, गो-मूत्र, करंज और गुड़ से जैविक खाद व कीटनाशक तैयार किए जाते हैं। सब्जियों की सुरक्षा के लिए वन उत्पादों से बना जैविक स्प्रे प्रयोग में लाया जाता है। रासायनिक खाद या दवा पर रोक है। गांव में बड़े पैमाने पर ब्रोकली, गोभी, मटर, टमाटर, मूली, नींबू सहित कई सब्जियों का उत्पादन हो रहा है। यहां उगाई गई सब्जियां बिहार, बंगाल और दिल्ली तक भेजी जा रही हैं। इसी वजह से धुरलेटा को ‘जैविक गांव’ का दर्जा मिला है।
पशुपालन भी आय का आधार किसान बिरसा उरांव बताते हैं कि अब गांव केवल खेती तक सीमित नहीं है। बकरी, मुर्गी और सुकर पालन से आमदनी बढ़ी है। वे स्वयं 100 से अधिक बकरी, सुकर और मुर्गी पाल रहे हैं। सात से आठ महीने में खस्सी तैयार हो जाती है, जिसकी बिक्री 10 हजार से 22 हजार रुपए तक होती है। नशा और मांसाहार से दूरी गांव के अधिकांश लोग जय गुरुदेव संत के अनुयायी हैं। यही वजह है कि गांव में नशापान और मांस-मछली का सेवन वर्जित है। नशे में आने वाले बाहरी लोगों को गांव में प्रवेश नहीं दिया जाता। गांव में बीमारियों की संख्या बेहद कम है। माहौल भी अनुशासित बना हुआ है। दूसरे राज्यों के लिए बना सीख धुरलेटा की जैविक खेती की पद्धति को अन्य गांवों में लागू करने के प्रयास हो रहे हैं। कई संस्थाएं अपने सदस्यों को यहां ट्रेनिंग के लिए भेज रही हैं। छत्तीसगढ़ से आए कृष्ण दयाल सिदा पिछले 20 दिनों से गांव में रहकर जैविक खेती, पशुपालन और ग्रामीण जीवनशैली को नजदीक से समझ रहे हैं। जंगल के बीच ऐसा समृद्ध -अनुशासित गांव पहले कभी नहीं देखा।


