झारखंड की बंद कोयला खदानों में मछली पालन का केज कल्चर अपनाएगा ऑस्ट्रेलिया; बदले में देगा तकनीकी सहयोग, एमओयू जल्द

झारखंड में बंद पड़े कोयला खदानों में शुरू किए गए केज कल्चर से मछली पालन के मॉडल ने अब अंतरराष्ट्रीय पहचान बना ली है। ऑस्ट्रेलिया इस मॉडल से इतना प्रभावित हुआ है कि वह अपने यहां भी बंद कोयला खदानों में इसी पैटर्न पर मछली पालन शुरू करेगा। इसके लिए झारखंड ओर ऑस्ट्रेलिया के बीच जल्दी ही एमओयू होगा। एमओयू का प्रारूप तैयार किया जा रहा है। इसके बदले ऑस्ट्रेलिया झारखंड को तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराएगा। इस पहल की नींव एक माह पहले उस वक्त पड़ी, जब ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर फिलिप ग्रीन रांची आए थे। उन्होंने सीएम हेमंत सोरेन और अफसरों के साथ बैठक की। इसमें कृषि और पशुपालन पर बातचीत हुई। जब बंद पड़े कोयला खदानों में केज कल्चर से मछली पालन का प्रजेंटेशन दिखाया गया। वे काफी प्रभावित हुए। उन्होंने इसे यूनिक, टिकाऊ और आर्थिक रूप से उपयोगी मॉडल बताया। उन्होंने कहा कि बंद खदानें तो ऑस्ट्रेलिया में भी काफी संख्या में हैं। उन्होंने दिल्ली स्थित ऑस्ट्रेलियाई उच्चायोग के एग्रीकल्चरल काउंसलर किरण करामिल को झारखंड भेजा। -शेष पेज 11 पर रामगढ़ के आरा कोयला खदान में केज कल्चर से मछली पालन। 5 जिलों में बंद खदानों में हो रहा मछली पालन राज्य के पांच जिलों रांची, रामगढ़, बोकारो, हजारीबाग और चतरा जिले में बंद कोयला खदानों में केज कल्चर से मछली पालन किया जा रहा है। सिर्फ रामगढ़ के आरा कोयला खदान में ही 22 एकड़ में मछली पालन हो रहा है। यहां कुजू मछुआरा सहकारी समिति ने केज कल्चर से मछली पालन शुरू किया है। करीब 16 साल से बंद इस खदान में 126 केज में मछली पालन किया जा रहा है। क्या है केज कल्चर मछली पालन केज कल्चर मछली पालन पानी में तैरते जालीदार पिंजरों (केज) का उपयोग कर मछली पालन की एक आधुनिक तकनीक है। इसमें नदी, झील या डैम जैसे जलस्रोतों का बेहतर उपयोग किया जाता है। इसमें पानी की गुणवत्ता नियंत्रित रहती है और मछलियों को खिलाना, देखना या पकड़ना आसान होता है। इस तकनीक से मछली पालन में कम मेहनत और कम निवेश में ज्यादा उत्पादन होता है, जिससे मछुआरों को अच्छी आय होती है।

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