इलाज के नाम पर उम्मीदें, घर-परिवार की जमा पूंजी और कर्ज सब कुछ दांव पर लगाने के बाद भी जब किसी परिवार को अपनों का शव तक समय पर न मिले, तो इसे सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं पर चोट कहा जाएगा। दयानंद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (डीएमसी) से जुड़ा ऐसा ही एक मामला अब पंजाब स्टेट एंड चंडीगढ़ (यूटी) ह्यूमैन राइट्स कमीशन तक पहुंच गया है। आयोग के चेयरमैन जितेंदर सिंह शंटी ने मामले को गंभीर मानते हुए अस्पताल प्रबंधन को चंडीगढ़ स्थित कार्यालय में तलब कर जवाब दाखिल करने के आदेश दिए हैं। मामला हैबोवाल निवासी अमर जोशी का, जिनकी 25 दिसंबर को डीएमसी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि मौत के बाद बकाया बिल का हवाला देकर अस्पताल प्रबंधन ने डेड बॉडी रिलीज करने से इनकार कर दिया। मजबूरी में परिवार ने मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया, जिसके हस्तक्षेप के बाद करीब 15 घंटे बाद शव सौंपा गया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि इसके बाद जो हुआ, उसने परिवार को अंदर तक तोड़ दिया। बॉडी रिलीज के बाद भी नोटिस, 18% जीएसटी के साथ 5.47 लाख मांगे परिजनों का आरोप है कि डेड बॉडी रिलीज होने के बाद भी अमर की पत्नी, जिन्होंने लिवर डोनेट किया था, उन्हें डिस्चार्ज नहीं किया गया। उनसे एक लाख रुपए और जमा कराने को कहा गया, जो परिवार ने ब्याज पर कर्ज लेकर दिए। इसके बाद उन्हें डिस्चार्ज किया गया। सबसे ज्यादा पीड़ा तब हुई जब परिवार को बाद में एक और नोटिस भेजा गया। इसमें 5 लाख 47 हजार 950 रुपये और उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी अलग से जमा कराने की मांग की गई। परिवार का कहना है कि बॉडी रिलीज के समय किसी अतिरिक्त बिल या बकाया की कोई जानकारी नहीं दी गई थी। 18 दिन के इलाज का पहले 17 लाख का पैकेज तय था, लेकिन महज सात दिन के इलाज का बिल 21 लाख रुपए बना दिया गया, यानी एक दिन का करीब तीन लाख रुपये। परिवार का कहना है कि उनके साथ धोखा हुआ है और यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक शोषण भी है। उन्होंने डीएमसी प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। 17 लाख पैकेज, पत्नी ने दिया लिवर, तीसरे दिन मौत, 15 घंटे बाद सौंपा शव परिवार के मुताबिक अमर जोशी के लिवर ट्रांसप्लांट के लिए 17 लाख रुपए का पैकेज तय हुआ था। अमर की पत्नी ने खुद लिवर डोनेट किया। परिवार का कहना है कि इलाज से पहले डीएमसी प्रबंधन की ओर से यह भरोसा दिया गया था कि लिवर ट्रांसप्लांट का ऑपरेशन सफल रहेगा, लेकिन ऑपरेशन के बाद ही अमर जोसी की तबीयत खराब होनी शुरू हो गई। ऑपरेशन के तीन दिन बाद ही अमर की मौत हो गई। कोई इंश्योरेंस नहीं था, फिर भी परिवार ने जान बचाने की आस में हर संभव कोशिश की। मृतक के परिवार ने बताया कि वे ब्राह्मण परिवार से हैं। उन्होंने दान में मिली जमीन को 10 लाख रुपए में बेच दिया। एक लाख रुपए रिश्तेदारों और परिचितों से मांगकर जुटाए गए। इसके अलावा परिवार की ओर से 1 लाख 61 हजार 550 रुपए तीन प्रतिशत ब्याज पर उधार लिए गए। यह पूरी रकम नकद अस्पताल में जमा करवाई गई। तमाम प्रयासों के बावजूद मौत के बाद डेड बॉडी रोक ली गई, जिससे परिवार मानसिक रूप से टूट गया। आयोग ने 6 दिसंबर को डेड बॉडी न रोकने की एडवाइजरी जारी की, फिर भी नहीं सौंपा शव 7 दिन इलाज, 21 लाख का बिल, मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा मामला, परिवार को न्याय का भरोसा दिया मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन जितेंदर सिंह शंटी ने परिवार को न्याय का भरोसा दिलाया है। पंजाब ह्यूमन राइट्स की ओर से 6 दिसंबर को पहले ही एडवाइजरी जारी की जा चुकी है कि किसी भी स्थिति में मौत के बाद डेड बॉडी नहीं रोकी जा सकती। मामले में जब डीएमसी के एमएस डॉक्टर संदीप शर्मा से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन कॉल नहीं उठाई और न ही मैसेज का कोई जवाब दिया। अब सबकी नजरें मानवाधिकार आयोग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं, जिससे इस परिवार को इंसाफ मिल सके और भविष्य में किसी और को ऐसी पीड़ा न झेलनी पड़े।


