रैली में दौड़ी 100 विंटेज-कार, पहली बार आई थीं 10:गौतम सिंघानियां की कार ने किया अट्रेक्ट, कार पर हर साल लाखों रुपए सिर्फ मेंटिनेंस पर खर्च होते है

जयपुर एक बार फिर अपने गौरवशाली अतीत और ऑटोमोबाइल विरासत के रंग में रंगी नजर आई। राजपूताना ऑटोमोटिव स्पोर्ट्स कार क्लब की ओर से आयोजित 27वीं विंटेज एंड क्लासिक कार एग्जीबिशन एंड ड्राइव के तहत रविवार को भव्य विंटेज कार रैली निकाली गई। ताज जय महल पैलेस से शुरू हुई इस रैली में 100 से अधिक विंटेज, क्लासिक और मॉडर्न क्लासिक कारें जयपुर की सड़कों पर दौड़ती दिखाई दीं, जिन्हें देखने के लिए शहरवासियों में जबरदस्त उत्साह नजर आया। रैली को पर्यटन विभाग के उपेंद्र सिंह शेखावत ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। जय महल पैलेस से शुरू होकर कारवां गवर्नमेंट हॉस्टल, एमआई रोड, पांच बत्ती, स्टेच्यू सर्कल, अंबेडकर सर्कल, जनपथ टर्न होते हुए चोमू सर्कल तक गया और पुनः जय महल पैलेस पहुंचा। रास्ते भर लोगों ने मोबाइल कैमरों में इन ऐतिहासिक कारों की खूबसूरती को कैद किया और तालियों से उनका स्वागत किया। विंटेज कारों की खूबसूरती ने मोहा शहर जयपुर की सड़कों पर जब दशकों पुरानी कारें शान से चलीं, तो मानो इतिहास जीवंत हो उठा। इन कारों की चमचमाती बॉडी, क्लासिक डिज़ाइन और शाही अंदाज़ ने हर उम्र के लोगों को आकर्षित किया। खास बात यह रही कि इन कारों के मालिक हर साल इनके रख-रखाव और रिस्टोरेशन पर लाखों रुपए खर्च करते हैं, ताकि इन ऐतिहासिक धरोहरों को मूल स्वरूप में संजोकर रखा जा सके। क्लब के वाइस प्रेसिडेंट सुधीर कासलीवाल ने बताया कि इस बार रैली में 100 से ज्यादा गाड़ियां शामिल हुईं, जिनमें कई बेहद रेयर और यूनिक कारें थीं। उन्होंने कहा कि यह 27वीं विंटेज कार रैली है। जब पहली बार यह आयोजन हुआ था, तब मुश्किल से 10 कारें ही शामिल हुई थीं। आज यह रैली देश के सबसे प्रतिष्ठित विंटेज कार आयोजनों में गिनी जाती है। इस बार आई कारें न सिर्फ दुर्लभ हैं, बल्कि बहुत ही खूबसूरती से रिस्टोर की गई हैं। ये कारें उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा हैं, जो विंटेज कारों को संजोने और बचाने का सपना देखते हैं। 1929 बुगाटी: चलती-फिरती शिल्पकला रैली में शामिल सबसे दुर्लभ कारों में 1929 की बुगाटी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। एट्टोरे बुगाटी की ओर से डिजाइन की गई यह कार अपने समय में इंजीनियरिंग और सौंदर्य का अद्भुत मेल मानी जाती थी। हल्का लेकिन मजबूत फ्रेम, हाथ से तैयार की गई बॉडी और बारीक मैकेनिकल डिटेलिंग इसे एक चलता-फिरता आर्ट पीस बनाती है। यही वजह है कि आज भी इसे ऑटोमोबाइल इतिहास की शाही कविता कहा जाता है। 1951 जगुआर XK 120: रफ्तार की पहचान उद्योगपति गौतम सिंघानिया की मुंबई से आई दो कारों ने लोगों को आकर्षित किया। पहली 1973 की ‘पॉन्टिएक फायरबर्ड’ क्लासिक अमेरिकन मसल कार है, इसमें 6.5 लीटर वी8 इंजन और 250-300 हॉर्सपावर की क्षमता है। यह कार मुंबई से ट्रक में जयपुर लाई गई, जिसपर करीब 2 लाख रुपए खर्च हुए। सिंघानिया ने इसे अमेरिका से लाकर अपने गैरेज में रिस्टोर किया, जिसके कई पार्ट्स अमेरिका से इंपोर्ट और कुछ पुराने कारों से लिए गए। इन कारों का मरीन पॉलिसी के तहत इंश्योरेंस करवाया गया। इसमें ट्रक से कार को दूसरे शहर में ले जाते वक्त किसी भी तरह का नुकसान हो जाए तो उसका इंश्योरेंस कवर मिलता है। उनकी दूसरी कार 1951 की ‘जगुआर एक्सके 120’ स्पोर्ट्स कार रही, जिसमें 160 हॉर्सपावर का 3.4-लीटर इनलाइन 6 सिलेंडर इंजन है। दोनों कारें शो स्टॉपर रहीं। इसी संग्रह की 1973 पोंटिएक फायरबर्ड अमेरिकी मसल कार संस्कृति की पहचान है। 6.5 लीटर V8 इंजन और 250 से 300 हॉर्सपावर की क्षमता वाली यह कार अपने दमदार लुक और आक्रामक स्टांस के लिए जानी जाती है। इसे खास तौर पर युवाओं और ऑटोमोबाइल शौकीनों ने खूब सराहा। 1941 पैकार्ड: दुनिया की पहली एसी वाली कार रैली में शामिल 1941 मॉडल पैकार्ड कार तकनीकी इतिहास में खास स्थान रखती है। यह दुनिया की पहली कार मानी जाती है जिसमें एयर कंडीशनिंग की सुविधा दी गई थी। उस समय इसे ‘वेदर कंडीशनिंग’ कहा जाता था। दिलचस्प बात यह है कि इस कार का ओरिजिनल एसी आज भी काम कर रहा है। यह कार कभी धौलपुर रियासत के शाही परिवार की सवारी रही थी, जो इसे और भी खास बनाती है। 1963 मॉरिस मिनी: सबसे छोटी लेकिन सबसे लोकप्रिय जयपुर के कार संग्रहकर्ता भरत कुमार गुप्ता की 1963 मॉरिस मिनी रैली की सबसे छोटी कार रही। ‘मिस्टर बीन’ की कार के नाम से मशहूर यह मिनी कूपर अपने कॉम्पैक्ट डिजाइन और शानदार ड्राइविंग अनुभव के लिए जानी जाती है। खास बात यह रही कि इसके मालिक आज भी इसे रोज़ाना ड्राइव करते हैं। 1964 मॉरिस माइनर 1000: भरोसे की पहचान चंडीगढ़ से ड्राइव करके जयपुर लाई गई 1964 मॉरिस माइनर 1000 भी रैली में शामिल हुई। यह कार अपनी मजबूती और भरोसेमंद परफॉर्मेंस के लिए मशहूर रही है। इंग्लैंड और श्रीलंका जैसे देशों में इसे टैक्सी के रूप में भी इस्तेमाल किया गया, जो इसकी टिकाऊ बनावट का प्रमाण है।

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