राजीविका से जुड़ने के बाद बदली किस्मत:16 हजार शुरू किया व्यापार 10 लाख पर पहुंचा, 30 महिलाओं को भी दिया रोजगार

एक ऐसी महिला जिसके परिवार के लालन पालन मुश्किल हो रहा था। आज वही महिला 30 हजार रुपये महीने कमा रही है। साथ ही उसने अपने कमाई से नया मकान बनाया है। इसके साथ ही वह 30 अन्य महिलाओं को रोजगार दे रही है। यह सब संभव राजीविका से जुड़ने के बाद हुआ है। महिला ब्रजेश हैंडमेड डोर मेट, पर्स, कार्पेट सहित कई सामान की व्यापारी बन चुकी है। साल 2015 तक परिवार की आर्थिक स्थिति थी कमजोर ब्रजेश भार्गव रूपवास के खानवा की रहने वाली हैं। उन्होंने बताया कि साल 2015 में वह सिर्फ एक घरेलू महिला थी। पति सत्यपाल मजदूरी करते थे। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। परिवार का लालन पालन भी मुश्किल हो रहा था। साल 2015 में वह पहली बार राजीविका से जुड़ी। जिसके बाद छोटा-मोटा काम करने लगी। राजीविका में जुड़ी महिलाओं के समूह के जरिए उन्हें हेंड मेड कार्पेट, डोर मेट, लेडीज बैग, ढलिया, महिलाओं के पर्स बनाने का आइडिया मिला। राजीविका से जुड़ने के बाद शुरू हुई आमदनी जिसके बाद साल 2016 में ब्रजेश ने जय शिव शंकर समूह से 20 हजार का लोन लिया। उस पैसे से उन्होंने हेंड मेड कार्पेट, डोर मेट, लेडीज बैग, ढलिया, महिलाओं के पर्स बनाये और, उन्हें लेकर वह जयपुर के सरस मेले में पहुंची। वहां पर उनका सारा सामान बिक गया। जिससे उन्हें करीब 20 हजार की आमदनी हुई। साल 2017 में उन्होंने फिर से समूह से लोन लिया और, कार्पेट, डोर मेट, लेडीज बैग, ढलिया, महिलाओं के पर्स बनाने की मशीन लेकर आईं। पहली बार उड़ीसा में मिला सम्मान उससे उन्होंने हेंड मेड सामान बनाना शुरू किया। ब्रजेश ने देशभर में लगने वाले राजीविका के मेलों में दुकानें लगाई। साल 2019 में ब्रजेश को उड़ीसा में सम्मानित किया गया। आज ब्रजेश के पास करीब 30 महिलाएं काम करती हैं। अब वह खुद जय शिव शंकर समूह की अध्यक्ष बन चुकी हैं। हाल में ब्रजेश ने जयपुर के जवाहर कला केंद्र में लगे राजसखी मेले में ब्रजेश को पहला इनाम मिला। प्राइज के रूप में ब्रजेश को 1 स्कूटी भी दी गई। जयपुर में जीती स्कूटी ब्रजेश ने बताया कि इस समय उनकी हर महीने की आमदनी 30 हजार या उससे ज्यादा हो जाती है। वह होलसेल डीलरों को भी माल सप्लाई करती हैं। जो महिलाएं उनके यहां काम करती हैं। उन्हें भी 10 से 12 हजार या उससे ज्यादा कमाई हो जाती है। साथ ही वह अब अपने इलाके की बाकी महिलाओं को प्रोत्साहित करती हैं। जिससे वह भी ब्रजेश की तरह आगे बढ़ सकें। बर्जेश ने दो समूह सिद्ध बाबा समूह और जय हनुमान ग्रुप को भी महिलाओं के कपड़े का काम खुलवाने में मदद कि ब्रजेश ने ही उन्हें यह आइडिया और सप्लाई के लिए कॉन्टेक्ट करवाए। पहली बार कतरन से बनाया डोर मेट साल 2015 से पहले हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति काफी ख़राब थी। साल 2016 में हमारे घर पर CRP टीम आई थी। उन्होंने मुझे राजीविका के बारे में समझाया। तब मुझे पता लगा की राजीविका से जुड़ने से क्या-क्या फायदे होते हैं। मैं साल 2015 में घर पर पिको की मशीन से साड़ियों पर पिको लगाती थी। साड़ियों के पल्लू सिलती थी। इस काम से साड़ियों की कतरन बचती थी। उस कतरन से हमने डोर मेट बनाया। समूह की अध्यक्ष ने दी प्रेणना राजीविका से जुड़ने के बाद समूह की अध्यक्ष घर आती रहती थी। उन्होंने कतरन से बनाये हुए डोर मेट को देखा तो, उन्होंने मुझे बताया कि यह तो, काफी अच्छा बनाया है। तब उन्होंने बताया कि इसी कारीगरी पर और काम किया जाए तो, यह और भी बेहतर बन सकता है। जिसके बाद मैं हैंडीक्राफ्ट के काम करने के लिए तैयार हो गई। महिलाओं के समूहों ने मेरी मदद की उन्होंने बताया कि कहां से माल आता है। कहां पर सप्लाई होता है। राजीविका से जुड़ने के बाद बनाया खुद का घर उसके बाद साल 2017 में हमने हेंडीक्राफ्ट का काम शुरू कर दिया। कुछ डोर मेट, मेट, पर्स और अन्य सामान बनाकर हम जयपुर के सरस मेले गए। वहां हमारी कारीगरी की काफी सराहना हुई। वहां से हमें करीब 20 आमदनी हुई। राजीविका से जुड़ने से हमारी स्थिति ख़राब थी। न तो अच्छा पहनने को था। न ही अच्छा खाने को था। अब अच्छा पहनते हैं। अच्छा खाते हैं। बच्चों को अच्छी एज्युकेशन देते हैं। पहले हमारे पास घर नहीं था अब हमने घर भी बनाया है।

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