चंडीगढ़ में 29 जनवरी को नगर निगम का नया मेयर चुना जाएगा। पंजाब-हरियाणा और देश के दूसरे राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के मुकाबले चंडीगढ़ मेयर का चुनाव अलग है। यहां पार्षद तो 5 साल के लिए चुने जाते हैं। लेकिन मेयर हर साल नया चुना जाता है। इस बार 5वीं और मौजूदा पार्षदों की आखिरी टर्म का मेयर चुना जाएगा। चंडीगढ़ में नए साल के पहले महीने यानी जनवरी में ही हर साल शहर को नया मेयर मिलता है। आखिर चंडीगढ़ में हर साल नया मेयर क्यों चुना जाता है। किस कानून के तहत यह जरूरी और क्यों, इसका फायदा और नुकसान क्या..। पिछले मेयर चुनावों के मुकाबले इस बार अलग क्या होने वाला है। ‘चंडीगढ़ मेयर- किस्सा कुर्सी का’ सीरीज की पहली स्टोरी में इन सब सवालों के जवाब के लिए पढ़िए पूरी रिपोर्ट… चंडीगढ़ में हर साल मेयर क्यों चुना जाता है?
चंडीगढ़ में हर साल मेयर चुनाव कानून से जुड़ा है। चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश है। चंडीगढ़ में पंजाब नगर निगम एक्ट-1976 को अडॉप्ट किया गया था। जिसे चंडीगढ़ म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन एक्ट-1994 का नाम दिया गया। इस ओरिजिनल एक्ट में तो मेयर का टेन्योर 5 साल का था लेकिन चंडीगढ़ नगर निगम ने कुछ बदलाव करते हुए पार्षद का 5 साल और मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर का 1 साल का कार्यकाल कर दिया। उसके बाद किसी ने भी इसे नहीं छेड़ा और ना ही आज तक हाउस की मीटिंग में यह मामला उठा है चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा की राजधानी, वहां क्या व्यवस्था है
चंडीगढ़ ने पंजाब के नगर निगम एक्ट को अडॉप्ट करने के बाद उसी की तर्ज पर अपना एक्ट लागू कर दिया। जिस वक्त चंडीगढ़ ने ये कानून अडॉप्ट किया, तब पंजाब में 5 साल के लिए ही मेयर चुना जाता था। अब यहां के पार्षद 5 साल के लिए मेयर का चुनाव करते हैं। हरियाणा की बात करें तो यहां भी 74वीं संशोधन अधिनियम के मुताबिक पहले एक साल के लिए मेयर चुना जाता था। हालांकि 1994 में हरियाणा ने अपना नगर निगम एक्ट बना दिया। जिसमें मेयर का कार्यकाल 5 साल कर दिया गया। एक साल और 5 साल के मेयर के फायदे-नुकसान क्या?
इस बारे में हमने चंडीगढ़ के सोशल एक्टिविस्ट व पॉलिटिकल एक्सपर्ट राम कुमार गर्ग से बात की। उन्होंने कहा- 1994 में जब यह कानून बना था, तब सोच यह थी कि कोई एक व्यक्ति लंबे समय तक ताकतवर न बने। अलग-अलग वार्डों और समूहों को मौका मिले। असली अधिकार प्रशासन यानी कमिश्नर के पास रहें। कागजों में यह व्यवस्था लोकतांत्रिक लगती है। लेकिन हकीकत में इसकी कई कमियां सामने आ चुकी हैं। उन्होंने कहा कि अगर 5 साल के लिए मेयर चुना जाए तो उनके पास स्कीम बनाने, लागू करने का पूरा मौका होगा। खासकर, सड़क-सीवरेज जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट के लिए 3 से 5 साल के टाइम की जरूरत होती है। 1 साल के कार्यकाल मेयर यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि मुझे टाइम ही नहीं मिला। लंबे टेन्योर से मेयर का अफसरों पर भी प्रभाव बनता है। क्योंकि वह जानते हैं कि 5 साल यही रहने वाले हैं तो फाइलें तेज चलती हैं। इसके अलावा हर साल चुनाव के चक्कर में राजनीतिक जोड़तोड़ भी बंद होगी। मेयर कितने साल के लिए कैसे चुना जाए, इसका प्रभावी तरीका क्या है?
इस बारे में हमने चंडीगढ़ के पूर्व सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन बंसल से बात की। वह कहते हैं कि मेयर का कार्यकाल 5 साल का ही होना चाहिए। इसे उसे लॉन्ग टर्म स्कीम-प्रोजेक्ट बनाने और उसे सिरे चढ़ाने का पूरा मौका मिलेगा। 5 साल की जवाबदेही मेयर को भी काम करने पर मजबूर करती है। चंडीगढ़ मेयर चुनाव में इस बार नया क्या है?
चंडीगढ़ में अब तक सीक्रेट बैलेट पेपर से मेयर का चुनाव होता रहा है। हालांकि इस बार निगम के पार्षद हाथ खड़े कर मेयर का चुनाव करेंगे। यह प्रक्रिया इसलिए अपनाई जा रही है ताकि क्रॉस वोटिंग न हो। पार्षद पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में वोट न कर सके। अगर वह ऐसा करे तो एक्सपोज हो जाए। हालांकि इसमें अभी एक चीज का पेंच है कि पार्षदों के हाथ सार्वजनिक तौर पर खड़े कराए जाएंगे या फिर चुनाव अधिकारी के आगे बंद कमरे में, इसको लेकर अभी स्थिति क्लियर नहीं है। चंडीगढ़ मेयर, जो विधानसभा स्पीकर की कुर्सी तक पहुंचे
ज्ञान चंद गुप्ता चंडीगढ़ के उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने नगर निगम चंडीगढ़ से अपना पॉलिटिकल करियर शुरू किया और फिर हरियाणा के विधानसभा स्पीकर की कुर्सी तक पहुंचे। वह 1996 में चंडीगढ़ निगम चुनाव में जीतकर पार्षद बने। इसके बाद 23 दिसंबर 1997 को मेयर बने थे। एक साल के मेयर का टर्म पूरा करने के बाद उन्होंने पंचकूला से विधानसभा चुनाव लड़ा। इसके बाद 2019 में वह हरियाणा विधानसभा के स्पीकर बने।


