कैंसर ने पहले पिता की जिंदगी छिन ली। मां सरीखी दो बड़ी बहनों को लील गया। खुद को प्रोस्टेट कैंसर हुआ। एक व्यक्ति के निराश और हताश होने के लिए इतना काफी है। लेकिन इन तमाम झंझावातों के बाद भी अगर कोई अपनी लड़ाई लड़े, जीते और फिर लोगों को जीने के लिए प्रेरित करे तो आप अंदाजा लगाइए कि उस व्यक्ति की इच्छाशक्ति कितनी मजबूत होगी। विश्व कैंसर दिवस पर आज हम आपको कोडरमा के एक ऐसे कैंसर सर्वाइवर की कहानी बता रहे हैं जिनकी उम्र आज की तारीख में 70 साल है। कैंसर से जंग जीत, कैंसर को धन्यवाद कहते किताब लिखी। किताब को नाम दिया ‘थैंक्यू कैंसर’। ऐसा करने वाले शख्सियत हैं डॉ अरुण मिश्रा। कैंसर को मैंने हराया नहीं, बल्कि उसे जीता डॉ अरुण मिश्रा को साल 2018 में कैंसर डिटेक्ट हुआ था। पहले तो हताश हो गए लेकिन धीरे-धीरे खुद को संभाला और ईलाज जारी रखा। इसी दौरान जब वे दिल्ली के एम्स पहुंचे तो इनके रिकवरी रेट को देखकर वहां के चिकित्सक भी हैरान रह गए। इसके बाद वहां के स्टूडेंट्स के बीच इनको संबोधित करने को कहा गया। जब इन्होंने वहां के विद्यार्थियों को संबोधित किया तो पाया कि इनके विचार कई कैंसर पीड़ित की जान बचा सकते हैं। यहीं से इनके अंदर कैंसर पर किताब लिखने की जिज्ञासा जागी, ताकि वैसे लोग जो कैंसर होने के बाद जीने की इच्छा छोड़ देते हैं, उन्हें इनकी किताब से जीने की प्रेरणा मिल सके। अपने कैंसर से संघर्ष को लेकर वो कहते हैं कि मैंने कैंसर को हराया नहीं है बल्कि उसे जीता है। परिवार के सपोर्ट ने बनाया विजेता इधर डॉ. अरुण ने बताया कि उनके परिवार में पत्नी, दो बेटियां, उनके भाई, भाई की पत्नी तथा उनके बेटे हैं। जैसे ही उन्हें मेरे कैंसर ग्रसित होने की बात पता चली, वे सभी लोग मेरे देखभाल में लग गए। इसके अलावे उन्होंने मुझे हर समय एक हिम्मत दी, जिससे मैं कैंसर से लड़ने के लिए तैयार हो सका। वह कहते हैं कि मेरे परिवार ने जो मुझे ऊर्जा दी है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बने 70 वर्षीय डॉ अरुण मिश्रा झुमरी तिलैया के देवी मंडप रोड के रहने वाले हैं। कैंसर से जंग जितने के अनुभव से भरी किताब ‘थैंक्यू कैंसर’ के दूसरे संस्करण का 2023 में झारखंड के राज्यपाल ने विमोचन किया था। इस किताब की प्रभावशीलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के सबसे बड़े कैंसर अस्पताल टाटा मेमोरियल ने अकेले 650 प्रतियां मंगवाई हैं। कैंसर अस्पताल रिसर्च करें, इसलिए शरीर कर दिया है दान डॉ अरुण मिश्रा ने बताया कि कैंसर से लड़ते हुए उन्होंने डॉक्टर की कल्पनाओं से भी काफी तेज गति से कैंसर में रिकवरी हासिल किया। उनके स्वास्थ्य परीक्षण के बाद डॉक्टर भी उनकी इस स्थिति को देखकर अचंभित हो गए थे। जिसके बाद डॉक्टर की टीम ने दूसरे मरीजों पर इसे लागू करने के लिए उनके ऊपर रिसर्च करना शुरू किया। डॉ अरुण मिश्रा ने बताया कि डॉक्टरों की टीम ने उन्हें 60 प्रश्नों की एक सूची देकर उनसे जवाब मांगा था। जिसमें कम समय में कैंसर से रिकवरी और दिनचर्या से जुड़े सवाल शामिल थे। उन्होंने कैंसर पर रिसर्च करने वाले चिकित्सकों के लिए अपने पूरे शरीर को दान कर दिया है। मृत्यु के उपरांत उनका शरीर मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट को सौंप दिया जाएगा। घर में बने बगीचे में ही बिताते हैं समय डॉ. अरुण ने बताया कि शरीर में प्रोस्टेट कैंसर डिटेक्ट होने के बाद आज भी उनका अधिकांश समय शिक्षण संस्थानों में मोटिवेशनल स्पीकर और घर में प्राकृतिक के बीच बगीचों में बीतता है। उन्होंने अपने बगीचे में 20 से भी अधिक वैराइटी के फूलों का एक बागान तैयार किया है। जब भी उन्हें एकांत की जरूरत पड़ती है तो इन्हीं फूलों के बीच बैठकर किताबें पढ़ लिया करते हैं। युवाओं से नशा त्यागने की अपील डॉ अरुण मिश्रा ने बताया कि आज के समय में कैंसर के अधिकांश मामले मुंह से जुड़े पाए जाते हैं। इसका स्पष्ट कारण है गुटखा-सिगरेट जैसे नशीले पदार्थों का सेवन करना। उन्होंने लोगों से अपील की है कि जीवन में न केवल कैंसर से बचने बल्कि स्वस्थ रहने के लिए भी गुटखा, सिगरेट जैसे नशीले पदार्थो का त्याग करना जरूरी है।


