मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति में बसंत पंचमी का पर्व मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रातःकाल में हुई, जहां समिति के सभापति पं. सत्यनारायण सत्तन के नेतृत्व में समिति के सदस्यों और उनके परिवारजनों ने पुस्तकालय कक्ष में स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा की विधिवत पूजा-अर्चना की। इसके बाद बसंत पर आधारित रचनाओं से कार्यक्रम महक उठा। इस अवसर पर महान साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का स्मरण भी किया गया। कार्यक्रम का दूसरा चरण सायं 5 बजे से प्रारंभ हुआ, जिसमें समिति और हिंदी परिवार के संयुक्त तत्वावधान में नियमित रूप से प्रथम सोमवार को आयोजित होने वाले श्रोता संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह विशेष कार्यक्रम समिति के कार्यवाहक प्रधानमंत्री घनश्याम यादव की अध्यक्षता में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस तरह वसंत पंचमी के पावन अवसर पर विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा और साहित्यिक गतिविधियों के माध्यम से भारतीय संस्कृति की परंपराओं को जीवंत रखा गया। कार्यक्रम के प्रथम खंड में साहित्यकार रमेश चंद्र शर्मा की कृति हिंदी फिल्मों की हस्तियां पर डॉक्टर अरुणा सराफ ने समीक्षात्मक विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कृति में फिल्म निर्माण कथा संवाद संगीत के साथ उन हस्तियों के संस्मरण प्रस्तुत किए गए हैं जो हमें प्रेरणा प्रदान करते हैं। लेखक डॉ रमेश चंद्र शर्मा ने कहा कि मैं कई विधाओं पर लिखता रहा हूं लेकिन फ़िल्म जगत ने भी मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम के दूसरे खंड में मां सरस्वती और वसंत को लेकर रचनाएं प्रस्तुत की गई डॉक्टर दीप्ति गुप्ता ने वीणा वादिनी वर दे… से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इसके पश्चात राम आश्रय पांडे ने सखी रे फागुन आया रे… एक लोकगीत सुना कर सबका मन मोह लिया। ओम उपाध्याय ने ऋतुओं का राजा आया बसंत, तो अरविंद जोशी ने जब वसंत को देखो… तथा डॉक्टर अशोक गर्ग की रचना झूम उठी है डाली डाली देखो कैसा आया वसंत…, स्वाति सिंह ने भारत भाव से भी तो मान, मां तू… गीत पढ़ा। सुधीर लोखंडे ने मन महक जाएगा बसंत जब आएगा…, डॉक्टर शशि निगम ने खेतों में सरसों फूली… रचना पढ़ी। कार्यक्रम का संचालन कर रहे हरेराम वाजपेयी ने मां सरस्वती की वंदना मां तु शारदे तुम्हें नमन… स्वरबद्ध कर सुनाई । इस अवसर पर परीक्षा मंत्री उमेश पारीक, पंडित रामचंद्र दुबे, कमल किशोर कासलीवाल, डॉ. संध्या राय चौधरी, दिलीप नेमा आदि साहित्यकार एवं सुधीजन उपस्थित थे। अंत में आभार व्यक्त करते हुए घनश्याम यादव ने कहा कि हमें अपने परिवारों में बच्चों को भारतीय संस्कृति से जुड़े त्योहारों के बारे में बताया जाना चाहिए, यह हमें प्रेरणा प्रदान करते हैं।


