जोधपुर के बहुचर्चित लवली कंडारा एनकाउंटर मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पेश करने पर रोक लगा दी है। जस्टिस फरजंद अली की कोर्ट ने जांच एजेंसी से तीखे सवाल पूछे हैं कि आखिर जांच के तौर-तरीकों पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया है कि यदि जांच का नतीजा ‘नेगेटिव फॉर्म’ यानी क्लोजर रिपोर्ट के रूप में है, तो उसे 12 फरवरी तक कोर्ट में पेश नहीं किया जाए। यह आदेश मृतक लवली के पिता नरेश कंडारा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया, जिसमें सीबीआई की जांच प्रक्रिया को “अपारदर्शी” बताया गया है। जांच के तरीके पर जवाब तलब लवली कंडारा एनकाउंटर मामले में बुधवार, 28 जनवरी को हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता के वकील रघुराज शर्मा ने तर्क दिया कि सीबीआई इस मामले में पुलिसकर्मियों को क्लीन चिट देते हुए फाइल बंद करने की फिराक में है। इस पर कोर्ट ने सीबीआई के वकील को निर्देश दिया कि वे याचिका में जांच एजेंसी पर लगाए गए आक्षेपों पर लिखित जवाब दें। कोर्ट ने साफ कहा कि जिस तरीके से जांच की गई है, उस पर स्थिति स्पष्ट करनी होगी। फ्लैशबैक: 13 अक्टूबर 2021 की वो खूनी दोपहर मामले की जड़ें करीब सवा चार साल पुरानी उस घटना में हैं, जिसने जोधपुर को हिला दिया था। शुरुआत: 13 अक्टूबर 2021 को हिस्ट्रीशीटर लवली कंडारा अपनी कार में सेनापति चौराहा के पास मौजूद था। आरोप है कि रातानाडा के तत्कालीन थानाधिकारी लीलाराम सादा वर्दी में वहां पहुंचे और पिस्टल हाथ में लेकर उसकी गाड़ी का कांच तोड़ने की कोशिश की। पीछा और फायरिंग: घबराकर लवली ने गाड़ी भगा दी। लीलाराम ने अपनी निजी गाड़ी से उसका पीछा किया। बनाड़ रोड पर पुलिस ने लवली की गाड़ी को ओवरटेक कर रोक लिया। एनकाउंटर: इसके बाद लीलाराम ने फायरिंग की, जिसमें लवली के पेट में गोली लगी। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। बताया जाता है कि उस समय कार में कुल 6 लोग थे, जिनमें से 2 भाग गए और 3 को पुलिस ने पकड़ लिया था। जांच का पेच: निलंबन, बहाली और फिर सीबीआई इस केस में पुलिस की कार्रवाई शुरू से ही सवालों में रही। निलंबन-बहाली का खेल: घटना के बाद भारी विरोध को देखते हुए 17 अक्टूबर 2021 को तत्कालीन पुलिस कमिश्नर जोस मोहन ने एसएचओ लीलाराम सहित 5 पुलिसकर्मियों- कांस्टेबल जितेंद्र सिंह, किशन सिंह, अंकित और विशाल को निलंबित कर दिया था। लेकिन, महज 9 दिन बाद 26 अक्टूबर 2021 को तत्कालीन डीसीपी (ईस्ट) भुवन भूषण ने उन्हें यह कहते हुए बहाल कर दिया कि विभागीय जांच में आरोप साबित नहीं हुए। सीबीआई की एंट्री: वाल्मीकि समाज के उग्र आंदोलन और सांसद हनुमान बेनीवाल द्वारा संसद में मुद्दा उठाने के बाद तत्कालीन गहलोत सरकार ने जांच सीबीआई को सौंपी। सीबीआई की दिल्ली ब्रांच ने जनवरी 2025 में इन पांचों पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। याचिकाकर्ता का तर्क: एनकाउंटर नहीं, हत्या है वकीलों ने कोर्ट में कहा कि एफआईआर में स्पष्ट आरोप है कि यह एनकाउंटर की आड़ में की गई हत्या थी। इसके बावजूद सीबीआई ‘नेगेटिव रिपोर्ट’ पेश करना चाहती है, जो पीड़ितों के साथ अन्याय होगा। कोर्ट ने अब 12 फरवरी को अगली सुनवाई तय की है, तब तक क्लोजर रिपोर्ट पेश करने पर अंतरिम रोक रहेगी। जानें क्या है नेगेटिव फॉर्म और आक्षेप: नेगेटिव फॉर्म: जब जांच एजेंसी को आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिलते और वह कोर्ट से केस बंद करने का अनुरोध करती है। इसे एफआर भी कहते हैं। आक्षेप: किसी की नियत या काम करने के तरीके पर लगाए गए लांछन या गंभीर आरोप।


