डिग्री हाथ में थी, भविष्य सामने था… लेकिन मंजिल तय नहीं थी। एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब ज्यादातर युवा नौकरी की कतार में खड़े होते हैं। तब इस युवक ने एक ऐसा रास्ता चुना, जिस पर न सैलरी स्लिप थी, न तय काम के घंटे और न ही सफलता की गारंटी पक्की थी। बस एक सपना था- अपना काम, अपनी पहचान। एक दिन गुरुदेव के शब्द कानों में पड़े- तुम्हें मधुमक्खी पालक बनना है…। यहीं से शुरू हुई उस सफर की कहानी। दफ्तर की कुर्सी की जगह मधुमक्खियों के बॉक्स थे और मीटिंग्स की जगह मौसम, फूल और नेक्टर से बातचीत था। शुरुआत में 7–8 लाख का जोखिम उठाकर 100 बॉक्स खरीदे, देश के कोने-कोने में मधुमक्खियों के साथ भटकता रहा। पहले साल मुनाफा न होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी। आज वही मेहनत 500 बॉक्स, 10 टन शहद और सालाना 5 से 6 लाख रुपए के नेट प्रॉफिट में बदल चुकी है। म्हारे देश की खेती में आज कहानी चित्तौड़गढ़ के किसान तरुण शर्मा (27) की … चित्तौड़गढ़ के मुंगाना (कपासन) गांव से निकलकर शहर की कैलाश नगर कॉलोनी तक पहुंचे तरुण आज देशभर में घूम-घूमकर शुद्ध शहद का उत्पादन कर रहे हैं। 1998 में जन्मे तरुण शर्मा के पिता कैलाश चंद्र शर्मा राजस्थान पुलिस में ASI हैं। मां सुशीला शर्मा गृहिणी हैं। जरूरत पड़ने पर वे बेटे के काम में भी हाथ बंटाती हैं। पत्नी पूजा शर्मा का भी उन्हें पूरा सहयोग मिलता है। पढ़ाई के मामले में तरुण शुरू से ही गंभीर रहे। उन्होंने संस्कृत साहित्य में एमए किया, साथ ही पीजीडीसीए और सोलर का कोर्स भी किया। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी की, लेकिन जीवन का रास्ता मधुमक्खी पालन ने तय कर दिया। आज यही काम उनकी पहचान, रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन चुका है। पहले सीखा, फिर शुरू किया कारोबार तरुण ने बताया- बिना तैयारी के कारोबार शुरू नहीं किया। करीब एक साल तक एक अनुभवी बी-कीपर के साथ काम किया। इस दौरान अलग-अलग जगहों पर बॉक्स लगाने, मौसम और फूलों के अनुसार मधुमक्खियों की देखभाल, नेक्टर की गुणवत्ता और शहद उत्पादन की बारीकियां सीखी। यही एक साल की ट्रेनिंग उनके आने वाले पांच साल के सफर की मजबूत नींव बनी। गुरुदेव की सीख और अनुभव के सहारे उन्होंने मधुमक्खी पालन को ही अपना व्यवसाय बना लिया। 100 बॉक्स से शुरुआत, 7-8 लाख का निवेश साल 2021–22 के आसपास तरुण ने अपने कारोबार की वास्तविक शुरुआत की। नैनीताल में एक बी-कीपर से उन्होंने लगभग 100 बिहाइव्स (मुधमक्खी के छत्ते) खरीदे। करीब 7 से 8 लाख रुपए का निवेश हुआ। इन बॉक्सों को लेकर वे नैनीताल से जम्मू, जम्मू से कश्मीर और फिर राजस्थान के विभिन्न इलाकों तक पहुंचे। यह सफर चुनौतीपूर्ण था, लेकिन इसी दौरान अनुभव और आत्मविश्वास दोनों बढ़ते चले गए। जहां फूल, वहीं मधुमक्खियां तरुण का काम पूरी तरह घूमंतू है। वे उसी स्थान पर अपने बॉक्स लगाते हैं, जहां उस समय किसी विशेष फसल या फूल की भरपूर उपलब्धता होती है।
सरसों के लिए टोंक-मालपुरा, अजवाइन के लिए प्रतापगढ़, बरसात में भरतपुर, सर्दियों में टोंक, कोटा और मध्यप्रदेश का गुना, जबकि अप्रैल के आसपास जम्मू–कश्मीर का रुख करते हैं। इस तरह वे देशभर में फूलों और नेक्टर के अनुसार मधुमक्खियों को स्थानांतरित करते हैं, ताकि शुद्ध और एक-फ्लोरल शहद तैयार हो सके। कई किस्मों का शहद, हर स्वाद अलग आज तरुण के पास सरसों, अजवाइन, तुलसी, बेरी, सौंफ, लीची, शीशम, तिल, धनिया, जामुन, कश्मीरी और मल्टी-फ्लोर शहद उपलब्ध है। हर शहद का स्वाद, खुशबू और रंग अलग होता है, क्योंकि वह अलग-अलग फूलों के नेक्टर से तैयार होता है। यही विविधता उनके ब्रांड की सबसे बड़ी ताकत है। ‘बी कीपर हनी 1998’ बना खुद का ब्रांड तरुण ने अपने ब्रांड का नाम ‘बी कीपर हनी 1998’ रखा। 1998 उनका जन्म वर्ष है और यह नाम भी गुरुदेव की सलाह पर तय किया गया। खास बात यह है कि वे किसी डिस्ट्रीब्यूटर या बड़े स्टोर पर निर्भर नहीं हैं। बी-कीपिंग से लेकर शहद निकालने, ट्रांसपोर्ट, पैकिंग और बिक्री के हर काम वे खुद संभालते हैं। बी2सी मॉडल पर सीधी बिक्री तरुण का पूरा काम डायरेक्ट टू कस्टमर (बी2सी) मॉडल पर आधारित है। फिलहाल उनका शहद किसी बड़े मार्केट या दुकान में उपलब्ध नहीं है। ग्राहक सीधे वॉट्सऐप, कॉल या इंस्टाग्राम के जरिए उनसे संपर्क करते हैं। सोशल मीडिया पर वे लगातार अपने काम से जुड़ी जानकारी और वीडियो साझा करते हैं, जिससे ग्राहकों का भरोसा बना है। आने वाले समय में वे अपने उत्पाद को बाजार में भी लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं। 100 से 500 बॉक्स तक पहुंचा सफर मधुमक्खियों की देखभाल से लेकर शहद निकालने और पैकिंग तक, हर प्रक्रिया में तरुण खुद शामिल रहते हैं। यही वजह है कि ग्राहक उनके शहद को शुद्ध और भरोसेमंद मानते हैं।
शुरुआत में लगाए गए 100 बॉक्स आज बढ़कर करीब 500 हो चुके हैं। इनमें से लगभग 300 बॉक्स नियमित रूप से सक्रिय रहते हैं। यह विस्तार किसी एक दिन में नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और धैर्य का परिणाम है। सालाना 5–6 लाख का नेट प्रॉफिट मधुमक्खी पालन पूरी तरह मौसम पर निर्भर करता है। पहले साल तरुण को खास मुनाफा नहीं हुआ, लेकिन नुकसान भी नहीं हुआ। दूसरे और तीसरे साल में मुनाफा बढ़कर 2 से 2.5 लाख रुपए तक पहुंचा।
आज तरुण सालाना करीब 10 टन शहद का उत्पादन कर रहे हैं और 5 से 6 लाख रुपए का नेट मुनाफा कमा रहे हैं। शहद की कीमत 500 से 1500 रुपए प्रति किलो तक रहती है, जो उसकी किस्म पर निर्भर करती है। ‘मधुमक्खियां कभी नीचे नहीं गिरने देती’ तरुण एक अनुभवी बी-कीपर की बात को हमेशा याद रखते हैं- मधुमक्खियां इंसान को कभी जीरो पर नहीं आने देतीं, या तो उसे स्थिर रखती हैं या आगे बढ़ाती हैं। लोगों को दे रहे रोजगार आज तरुण के साथ करीब छह लोग काम कर रहे हैं, जो बॉक्स संभालने, ट्रांसपोर्ट और अन्य कार्यों में मदद करते हैं। इस तरह उनका व्यवसाय दूसरों को भी रोजगार दे रहा है। इसके अलावा कई लोग उनसे सीख कर बिजनेस को जीवन में अपना रहे है। — खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… लॉकडाउन में दुकान बंद,मेथी की खेती से लाखों की कमाई:कर्ज लेकर की शुरुआत; हैदराबाद से लौटे थे गांव, दोस्त की सलाह ने बदली किस्मत हैदराबाद में बड़े भाई के कहने पर पढ़ाई अधूरी छोड़कर बिजनेस संभाला। आठ साल तक दिन-रात मेहनत की, लेकिन काम का दबाव, नींद की कमी ने थका दिया। पूरी खबर पढ़िए


