फाइलों में चलती रहीं 244 सिटी बसें, ऑटो-टोटो के भरोसे रह गई रांची

रांची को राजधानी बने 25 साल हो गए हैं। इतने वर्षों के बाद भी शहर में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली विकसित नहीं हुई। सार्वजनिक परिवहन प्रणाली दुरुस्त करने की कवायद पिछले पांच वर्षों से चल रही है। शहर में 244 नई सिटी बसें चलाने की योजना बनी थी। इसके लिए टेंडर किया गया। जिस मॉडल पर बसों का परिचालन किया जाना था, उसके लिए कोई कंपनी आगे नहीं आ रही थी। पिछले वर्ष दो कंपनियां बस खरीद कर चलाने के लिए तैयार हुईं। तब दो टेंडर पड़े। निगम ने टेंडर का मूल्यांकन करके इसका प्रस्ताव नगर विकास विभाग को भेजकर मार्गदर्शन मांगा, लेकिन आज तक विभाग ने उक्त प्रस्ताव पर कोई निर्देश नहीं दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि सिटी बसें फाइलों में चलती रहीं। सड़कों पर ऑटो-टोटो की भरमार हो गई। जाम और प्रदूषण रांची के लोगों की रोजमर्रा की समस्या बन गई है। वह सब कुछ जो आपके लिए जानना जरूरी है पुरानी बसें कंडम होती गईं, नई से हो रही खानापूर्ति निगम ने वर्ष 2010 में 70 सिटी बसों की खरीदारी की थी। वे सभी बसें कंडम हो गईं। अब वे खादगढ़ा बस स्टैंड में लगी हैं। इसके बाद निगम ने वर्ष 2016 में टाटा मोटर्स की 26 सिटी बसों की खरीदारी की थी। नई बस आने से यात्रियों को बड़ी राहत मिली, लेकिन इसका भी मेंटेनेंस नहीं होने से जैसे-तैसे यात्री सफर कर रहे हैं। सिर्फ एक रूट तक सीमित रह गईं सिटी बसें पहले रातू रोड से कांटाटोली होते हुए धुर्वा तक बसें चलती थीं, लेकिन अब निगम की मात्र 24 बसें ही चल रही हैं। कचहरी चौक से मेन रोड, राजेंद्र चौक होते हुए धुर्वा तक बसें चल रही हैं। इस वजह से दूसरे रूट के यात्रियों को ऑटो या निजी वाहन का सहारा लेना पड़ रहा है। महिलाओं के लिए चार स्पेशल बस चलाने का दावा किया जाता है, लेकिन सड़क पर वे कम ही दिखती हैं। आए दिन छेड़खानी की शिकार हो रहीं महिलाएं सिटी बस में सफर करने वाली अधिकतर लड़कियां-महिलाएं छेड़खानी की शिकार होती हैं। नाम नहीं छापने की शर्त पर कई महिला यात्रियों ने बताया कि बसों में इतनी भीड़ होती है कि कई पुरुष यात्री जानबूझ कर धक्का देते हैं या गलत तरीके से छूने का प्रयास करते हैं। अब यह दिनचर्या बन गई है। परिवहन का साधन नहीं होने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बस में सीट नहीं मिलती, खड़े होकर सफर करना पड़ता है: संजू शेरपा कडरू की संजू शेरपा कहती है कि सिटी बसों की स्थिति खराब है। बसों की सीटें टूटी हुई हैं, जो बैठने लायक नहीं बची हैं। भीड़ के कारण महिलाओं को सीट नहीं मिलती है। खड़े होकर सफर करना पड़ता है। इस कारण महिलाओं को काफी परेशानी होती है। सिटी बसों में सांस लेना मुश्किल, धक्का-मुक्की आम बात: जया जया ने बताया कि वह रोजाना सिटी बस से यात्रा करती हैं। हर दिन बस यात्रियों से खचाखच भरी होती है। भीड़ के कारण बस के अंदर सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। पसीना, घुटन और धक्का-मुक्की, छेड़खानी आम बात है। महिलाओं के लिए चार स्पेशल बस चलाने का दावा, लेकिन वे भी सड़क पर कम ही दिखती हैं सिर्फ रंग बदल रहा बसों का, व्यवस्था वही घिसी-पिटी 10 साल पहले खरीदी गई बसों का रंग लाल था, बाद में मंईयां सम्मान योजना लागू होने के बाद इसका रंग बदलकर गुलाबी कर दिया गया, लेकिन पिछले साल सभी बसों का रंग फिर बदलकर नीला कर दिया गया। बसों में सरकार की योजनाओं का बखान किया गया है, लेकिन आप बस के अंदर बैठ जाएं तो व्यवस्था को कोसते हुए ही सफर पूरी होगी। बसों में यात्रियों को ठूंस-ठूंस कर ले जाया जा रहा है। जिस तरह बसों के रंग बदले गए, उसी तरह अगर अंदर की सीट, कल-पुर्जे भी बदले जाते तो यात्रियों को थोड़ी राहत भी मिलती, लेकिन नगर निगम ने ऑपरेटर के जिम्मे बस करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है। ऑपरेटर अपनी मनमानी कर रहे हैं। पिछले 25 सालों में रांची नगर निगम ने सार्वजनिक परिवहन के नाम पर करीब 11 करोड़ रुपये खर्च करके 96 सिटी बसों की खरीदारी की। यह पैसे भी केंद्र सरकार से जेएनएनयूआरएम योजना के तहत मिले थे। उक्त फंड से पहले फेज में 2010 में 7.50 करोड़ से 70 सिटी बसों की खरीदारी की गई। निगम बस खरीदने के बाद चलाने के लिए ऑपरेटर खोजता रहा, लेकिन नहीं मिला। तीन माह तक बस पार्किंग में खड़ी रही। इसके बाद इसे चलाने की जिम्मेदारी जेटीडीसी को दे दी गई। जेटीडीसी ने पांच साल बस चलाने के बाद निगम को वापस कर दिया। इसके बाद 4 बसें जल गईं, बाकी जो बचीं, वे कबाड़ हो गईं। इसके बाद वर्ष 2016 में करीब 3 करोड़ की लागत से 26 नई बसें खरीदी गईं। इसमें से 22 बसें मेन रोड में चल रही हैं।

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