HC- ‘एससी-एसटी एक्ट को ‘उत्पीड़न का हथियार’ नहीं बनने देंगे:राजसमंद सड़क नामकरण विवाद; फरियादी ने जिसे ‘मुजरिम’ बताया, वीडियो में वही उसे पीटता दिखा

राजसमंद में एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के नाम पर सड़क का नाम बदलने के विवाद में एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग की आशंका पर राजस्थान हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है। जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि संविधान के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग कर कानून की प्रक्रिया को ‘उत्पीड़न का औजार’ नहीं बनने दिया जाएगा। मामला तब पूरी तरह पलट गया जब कोर्ट में एक वीडियो चलाया गया, जिसमें एससी-एसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज कराने वाला फरियादी खुद ‘आरोपी’ को लात-घूंसों से पीटता हुआ नजर आया। इस ‘लाइव सबूत’ को देखते ही गिरफ्तारी की जिद पर अड़े पुलिस अधिकारी को कोर्ट में ‘यू-टर्न’ लेना पड़ा। वीडियो चलते ही बैकफुट पर आई पुलिस जस्टिस फरजंद अली की कोर्ट में बुधवार (28 जनवरी) को अजीब स्थिति बन गई। सुनवाई की शुरुआत में जांच अधिकारी (DySP रोहित चावला) ने दावा किया कि याचिकाकर्ता भरत कुमार दवे के खिलाफ अपराध साबित हो चुका है और गिरफ्तारी की तैयारी है। तभी याचिकाकर्ता के वकील ने एक वीडियो क्लिप पेश कर दी। वीडियो का सच: वीडियो में दिखा कि 5-6 लोग याचिकाकर्ता को जकड़े हुए हैं और गवाह/परिवादी जयराज (नगर परिषद का जमादार) उसे लात-घूंसों से मार रहा है। जांच अधिकारी की स्वीकारोक्ति: जांच अधिकारी ने वीडियो में लोगों की पहचान की। पहले तो उन्होंने कहा कि यह वीडियो दूसरी एफआईआर का है, लेकिन कोर्ट की सख्ती के बाद “अनिच्छा से” माना कि यह उसी घटना का वीडियो है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह वीडियो उनके पास पहले नहीं था, इसलिए इस पहलू की जांच ही नहीं हुई। पुलिस की ‘सजावटी कहानी’ और अनदेखी कोर्ट की नाराजगी का एक बड़ा कारण पुलिस की कार्यशैली रही। प्रतिवेदन रद्दी में: याचिकाकर्ता ने पहले भी एक याचिका लगाई थी, जिसे वापस लेकर उन्होंने कोर्ट के निर्देश पर जांच अधिकारी को विस्तृत प्रतिवेदन दिया था। कार्रवाई शून्य: कोर्ट ने केस डायरी देखकर पाया कि जांच अधिकारी ने उस प्रतिवेदन को सिर्फ फाइल में नत्थी कर दिया, उस पर कोई कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने इसे ‘पूर्व निर्धारित मानसिकता’ करार दिया। टिप्पणी: कोर्ट ने कहा कि पुलिस तथ्यों को अपनी सुविधा के अनुसार चुनकर एक “सजावटी कहानी” गढ़ रही है। प्रतिवादी पक्ष: याचिका वापस लेने के बाद राहत का हक नहीं प्रतिवादी के वकीलों ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कई तर्क रखे। उन्होंने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता इससे पहले भी एफआईआर रद्द करने की मांग को लेकर एक याचिका दायर कर चुके थे, जिसे उन्होंने वापस ले लिया था। एक बार याचिका वापस लेने के बाद, उसी राहत के लिए दोबारा अदालत आना उचित नहीं है और याचिकाकर्ता का उद्देश्य केवल जांच को बाधित करना है। उन्होंने दलील दी कि एफआईआर रद्द करने की स्टेज पर अदालत को सबूतों का विश्लेषण नहीं करना चाहिए, बल्कि केवल यह देखना चाहिए कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया अपराध की श्रेणी में आते हैं या नहीं। उनके अनुसार, एफआईआर में सरकारी अधिकारियों के साथ मारपीट और जातिगत अपमान के गंभीर आरोप हैं, जो जांच का विषय हैं। कोर्ट का लॉजिक: चपरासी को कोई गाली क्यों देगा? जस्टिस फरजंद अली ने प्रतिवादी के तर्कों का जवाब तार्किक रूप से दिया। कोर्ट ने माना कि सरकारी काम में बाधा और चोट पहुंचाने के आरोप प्रथम दृष्टया बनते हैं और उनकी जांच होनी चाहिए। लेकिन एससी-एसटी एक्ट के आरोपों पर कोर्ट ने सवाल उठाए: मकसद नदारद: कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता एक “जागरूक नागरिक” के तौर पर ऐतिहासिक व्यक्तित्व से जुड़ी सड़क का नाम बदलने का विरोध कर रहा था। अधिकार क्षेत्र: सड़क का नाम बदलना या रोकना जमादार (चपरासी) के अधिकार में था ही नहीं। सवाल: याचिकाकर्ता की जमादार से कोई पुरानी दुश्मनी नहीं थी। ऐसे में वह उसे ही चुनकर जातिगत गालियां क्यों देगा? बिना किसी मकसद के ऐसे आरोप गंभीर संदेह पैदा करते हैं। दो एफआईआर, एक घटना: जांच क्लब करने के आदेश कोर्ट ने पाया कि एक ही घटना की दो अलग-अलग एफआईआर (क्रॉस केस) दर्ज हैं, जिनमें विरोधाभासी कहानियां हैं। निर्देश: कोर्ट ने आदेश दिया कि जब दो एफआईआर एक ही घटना से जुड़ी हों, तो निष्पक्षता के लिए उनकी जांच एक साथ की जानी चाहिए ताकि विरोधाभासी निष्कर्ष न निकलें। लाइव सबूत: कोर्ट ने कहा कि एक तरफ “कोरे आरोप” हैं और दूसरी तरफ “लाइव वीडियो”। जांच अधिकारी को दोनों को तौलना होगा। अब सीनियर अफसर करेंगे निगरानी जांच में पूर्वाग्रह की आशंका को देखते हुए कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया है कि निष्पक्षता बनाए रखने के लिए, यदि उचित लगे, तो किसी एडिशनल एसपी या वरिष्ठ अधिकारी को इस जांच की निगरानी या जांच के लिए नियुक्त करें। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता भरत कुमार दवे को 10 फरवरी तक जांच अधिकारी के सामने पेश होकर वीडियो सौंपने और बयान दर्ज कराने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि अगली सुनवाई (16 फरवरी) तक और जांच के निष्पक्ष निष्कर्ष तक उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

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