रांची नगर निगम के गठन के बाद पार्षद का चुनाव चार सालों के लिए होता था, जबकि मेयर आैर डिप्टी मेयर का चुनाव एक वर्ष के लिए होता था। पार्षद ही वोटिंग से मेयर-डिप्टी मेयर का चुनाव करते थे। पहले मेयर उदय प्रताप सिंह का कार्यकाल 1990 में समाप्त हो गया। इसके बाद दूसरे मेयर के चुनाव की सरगर्मी बढ़ गई। कांग्रेस नेताओं का एक गुट पहले मेयर उदय प्रताप सिंह को दुबारा मेयर बनाने में जुटा था, जबकि एक गुट का मानना था कि सभी को मौका मिलना चाहिए। इसलिए दूसरे चेहरे को सामने लाना चाहिए। पार्षदों के बीच अशोक कुमार सिंह भी पैठ बनाए हुए थे, क्योंकि वे भी पहली बार पार्षद बने थे। वे लोगों से अधिक घुले-मिले हुए थे। आखिरकार मेयर के चुनाव की तारीख का ऐलान हो गया। नगर निगम बिल्डिंग में बोर्ड की बैठक बुलाई गई। पहले मेयर उदय प्रताप सिंह और अशोक कुमार सिंह मेयर पद के दावेदार थे। 37 चुने हुए पार्षद और 5 सरकार द्वारा नॉमिनेटेड पार्षदों ने वोट डाला। काउंटिंग हुई तो अशोक कुमार सिंह को 25 वोट मिले और उदय प्रताप सिंह को 17 वोट। इसके बाद अशोक कुमार सिंह रांची के दूसरे मेयर बने। मेयर बनने के बाद भी शहर का विकास सबसे बड़ी चुनौती थी, क्योंकि उस समय फंड नहीं मिलता था। इसके लिए हमलोगों ने एक तरकीब निकाली। बिहार के तत्कालीन नगर विकास मंत्री को रांची में आमंत्रित किया गया। निगम सभाकक्ष में ही मेयर-पार्षदों के साथ मंत्री ने बैठक की। मंत्री को बताया गया कि निगम के हालात ऐसे हैं कि कर्मचारियों को वेतन देना भी मुश्किल हो जाता है। विकास का काम कैसे होगा। उन्होंने फंड देने का भरोसा दिया। फंड मिलने के बाद पहली बार दर्जनों मुहल्लों में एक साथ सड़क,नाली,कल्वर्ट बनाया गया। लेकिन हरेक बार योजना स्वीकृत कराने के लिए पटना जाकर मंत्री से मिलना पड़ता था। 1986 में पार्षद बनने के बाद दुबारा चुनाव ही नहीं हुआ। मेयर का कार्यकाल भी एक साल का था। इसलिए कार्यकाल समाप्त होने के बाद बोर्ड भंग हो गया। इसके बाद संयुक्त बिहार में दुबारा चुनाव नहीं हुआ। झारखंड बनने के बाद पहली बार 2008 में नगर निगम का चुनाव हुआ, लेकिन तब तक पहले वाला पूरा दृश्य बदल चुका था। बड़ा तालाब से जलकुंभी साफ हुआ, लोगों ने पहली बार की बोटिंग रांची के दूसरे मेयर अशोक कुमार सिंह ने बताया कि मेयर बनने के बाद मैने पहला काम बड़ा तालाब को संवारने का किया। बड़ा तालाब पूरी तरह जलकुंभी से भरा था। जलकुंभी साफ करने के लिए एक लाख रुपए मिले थे, उस पैसे को निगम के अधिकारी वापस करना चाहते थे। मैने फाइल मंगाई आैर अधिकारियों को कहा कि तालाब की सफाई होगी। गांव से 50 मजदूर बुलाकर तालाब की सफाई में लगाया। देखते ही देखते तालाब पूरी तरह साफ हो गया। उस समय रांची के तत्कालीन डीसी सुधीर प्रसाद थे। उन्हें बड़ा तालाब में वोट चलाने का प्रस्ताव दिया गया। वे तैयार हो गए। इसके बाद बड़ा तालाब में पहली बार वोट चला। लोगों को अपने शहर में वोटिंग का पहला अनुभव मिला। उस समय हातमा, चौड़ी बस्ती, भीठा, सरईटांड, सिंदवार टोली, एदलहातू, चिरौंदी,चंदवे और टिकरी टोला गांव था। वहां बिजली तक नहीं पहुंची थी। बिजली विभाग से समन्वय बनाकर 3 फेज का लाइन और 100 केवीए का ट्रांसफार्मर लगवाया। इसके बाद शहर के विभिन्न क्षेत्रों में सोडियम स्ट्रीट लाइट लगवाया। चापहली बार निगम क्षेत्र में 1250 लोगों का वृद्धावस्था, विधवावस्था, दिव्यांगता पेंशन स्वीकृत कराया। उस समय ऐसे हालात थे कि मेयर आैर पार्षद रोजाना एक वार्ड घूमते थे। समस्याओं की सूची बनती थी। इसके बाद उसे दूर करने के लिए फंड की व्यवस्था की जाती थी।


