सिविल अस्पताल की मॉर्चरी में एक महीने से नवजात की लाश पड़ी है। उसे अंतिम संस्कार का इंतजार है। पिता बनारसी दास मनहूस मानकर बच्चे का मरा मुंह भी देखना नहीं चाहता, क्योंकि बच्चे की मौत के बाद उसकी प|ी भी तीन जनवरी को गुजर गई थी। ऐसे में पिता ने सिर्फ पत्नी के शव का ही अंतिम संस्कार किया। फिलहाल वह जांडियाली से गांव बिहार के सारण जा चुका है। पुलिस की बार-बार की गुजारिश के बाद भी वह शव को लेने से मना कर रहा है। बच्चे का जन्म 31 दिसंबर की सुबह साढ़े दस बजे हुआ था। कमजोर शरीर के चलते दो जनवरी को उसकी और अगले दिन मां की मौत हो गई थी। बाद में मरी मां को तो मिट्टी मिल गई लेकिन बच्चे को नहीं। ऐसे में पढ़िए.. मासूम की रूह क्या सोचती होगी, अगर वह बोल पाता तो क्या कहता….। निलंबन की कार्रवाई भी संभव पुलिस को 7 दिन के भीतर समाजसेवी संस्था के जरिये अंतिम संस्कार करवाना होता है। यह लापरवाही है। जिम्मेदार निलंबित हो सकता है। एसएचओ बोले- मैं शर्मसार फोकल पॉइंट एसएचओ कुलवीर राज ने कहा, एएसआई की लापरवाही के लिए मैं शर्मसार हूं, कल मैं अंतिम संस्कार करवाऊंगा। एएसआई गुरमीत सिंह ने कहा कि दो दिन में अंतिम संस्कार करवा दूंगा। मॉर्चरी में 31 दिनों से मासूम की लाश को मिट्टी का इंतजार मैं कागज में लिपटा शव नहीं सवाल भी हूं, मेरे साथ ऐसा सलूक क्यों ? पापा मैं मनहूस नहीं… आपका ही हिस्सा हूं। अफसोस है कि दुनिया को देखा भी नहीं था, मां गुजर गई। आप रूठ गए। मुझे मेरे हिस्से का प्यार भी नहीं मिला। अब मिट्टी भी नसीब नहीं हो रही। ऐसे में मुझे तो कुसूरवार मत ठहराओ। अपना फर्ज निभाओ। अस्पताल प्रबंधन- मामले को देख रहे डॉक्टर गुर सिमरन सिंह ने तीन जनवरी समेत दो बार पुलिस को लिखित में जानकारी दी और फोन भी किया। पिता बोले- बनारसी दास ने फोन पर कहा कि ये बच्चा मनहूस है, इसके आने से मेरी प|ी की मौत हो गई। मैं इसका मरा मुंह भी नहीं देखना चाहता। भास्कर एक्सपर्ट दुष्यंत धवन, सीनियर क्रिमिनल वकील “मैंने इस क्रूर दुनिया में आंखें खोली ही थी कि कुदरत ने उसे बंद कर दिया। मेरी सांसें दो पल की तरह ही महज दो दिन ही रहीं। नौ महीने गर्भ में रखकर मेरे जन्म का पल-पल इंतजार करने वाली मां ने मुझे ठीक से कलेजे से लगाया भी नहीं था, क्योंकि वह भी बीमार थी। तभी अचानक मेरे गुजरने के बाद वह भी दुनिया को छोड़ गई। शायद वह अपनी पीड़ा के साथ ही मुझ से बिछड़ने का दर्द बर्दाश्त नहीं कर पाई होगी। अब मैं और मां साथ हैं। मां का अंतिम संस्कार हो गया, पर अफसोस है कि मुझे अब तक मिट्टी नसीब नहीं हुई। एक महीने से फ्रीजर में बंद हूं। सबसे बड़ा दर्द यह है कि हम दोनों को खोने के बाद सदमें से गुजर रहे पिता मेरा मरा मुंह भी नहीं देखना चाहते। शायद वक्त के साथ पता चल जाएगा कि मैं बेकसूर हूं। मनहूस नहीं। मैं तो खुद ही मां के प्यार, पिता के दुलार से महरूम रहा। पर सिस्टम भी इतना क्रूर निकला कि मुझे मेरा अंतिम हक यानी मिट्टी नहीं मिल रही है। मैं इस सर्दी में मोर्चरी में कागज के गत्ते में लिपटा हुआ मासूम शव नहीं बड़ा सवाल भी हूं। मेरे साथ इंसानों जैसा सलूक क्यों नहीं हो रहा। पापा से शिकायत नहीं गुजारिश है- अपनी गोद में लेकर फर्ज निभाओ, क्योंकि मैं इस दुनिया में सिर्फ आपका अंश हूं।”


