CSVTU में 9.44 लाख का PhD फीस घोटाला:30 छात्रों से पीएचडी सब्मिशन के लिए 30-30 हजार रुपए, सभी को थमाया फर्जी रसीद, विवि के सलाहकार पर एफआईआर दर्ज

छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय (सीएसवीटीयू) भिलाई में पीएचडी शोधार्थियों से फीस लेकर उन्हें फर्जी रसीद थमाने और पैसों को अपने पास रखने के मामले में अब पुलिस ने पीएचडी शाखा में पदस्थ कनिष्ठ सलाहकार सुनील कुमार प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर लिया है। छात्रों से पीएचडी सब्मिशन के नाम पर 30-30 हजार रुपए लिए जाते थे, लेकिन उन्हें जो रसीद दी जाती थी वो फर्जी रसीद होती थी। इसका खुलासा छात्रों की शिकायत के बाद हुआ था। नए कुलपति के पास जब छात्र शिकायत लेकर पहुंचे तो धीरे-धीरे कई छात्र सामने आए। इसको लेकर विश्वविद्यालय ने नेवई थाने में शिकायत की थी। 9 लाख से ज्यादा राशि का गबन
विश्वविद्यालय प्रशासन की शिकायत पर थाना नेवई में पीएचडी शाखा में पदस्थ कनिष्ठ सलाहकार सुनील कुमार प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। प्रारंभिक जांच में 9 लाख 44 हजार 500 रुपए के गबन की पुष्टि हुई है। विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलसचिव द्वारा 27 जनवरी को थाना नेवई को भेजे गए पत्र में बताया गया कि पीएचडी में पंजीकृत कई शोधार्थियों ने कुलपति को शिकायत दी थी कि उनसे निर्धारित फीस तो ली गई, लेकिन विश्वविद्यालय के खाते में राशि जमा नहीं की गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने दो सदस्यीय जांच समिति गठित की। कुलपति बोले- यह सिर्फ प्रांरभिक जांच के आंकड़े, बढ़ सकती है गबन की राशि
इस मामले में सीएसवीटीयू के कुलपति डॉ. अंकित अरोरा ने कहा कि पीएचडी पाठ्यक्रम में ₹30,000 की जो सबमिशन फीस ली जाती थी, उसमें संबंधित कर्मचारियों एवं अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जीवाड़ा किया जा रहा था। ₹30,000 की फीस की फर्जी रसीद दी जा रही थी, जबकि यह राशि विश्वविद्यालय में जमा नहीं हो रही थी। इस संबंध में लगातार शिकायतें प्राप्त हो रही थीं। प्रारंभिक जांच में करीब 10 लाख के गबन की राशि सामने आई है, लेकिन जांच में यह और ज्यादा बढ़ सकता है। पीएचडी सब्मिशन फीस में एक-एक छात्रो से लिए 30-30 हजार
शिकायतों के आधार पर दो सदस्यीय समिति से जांच कराई गई। प्रारंभिक जांच में यह तथ्य सामने आया कि लगभग ₹10 लाख रुपए का गबन हुआ है। इस संबंध में नेवई थाना में आवेदन देने के बाद पुलिस ने अपराध पंजीबद्ध कर लिया है। थाना प्रभारी विश्वविद्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने परीक्षण किया तथा संबंधित व्यक्तियों के बयान लिए। बताया जा रहा है कि इस विद्यार्थियों से सबमिशन फीस के लिए 30-30 हजार रुपए लिए गए और उन्हें फर्जी रसीद दी गई। जांच में फर्जी रसीदें मिलीं
जांच समिति की रिपोर्ट में सामने आया कि सुनील कुमार प्रसाद ने शोधार्थियों से नकद फीस ली और उन्हें जो रसीदें दी गईं, वे फर्जी पाई गईं। कुछ मामलों में फीस की राशि सीधे उसके निजी बैंक खाते में ऑनलाइन ट्रांसफर कराई गई। पूछताछ के दौरान आरोपी ने नकद राशि लेने की बात स्वीकार की। तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव का नाम भी आया
जांच के दौरान सुनील कुमार प्रसाद ने लिखित बयान में दावा किया कि वह शोधार्थियों से ली गई राशि तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव अंकित अरोरा को सौंप देता था और बदले में उन्हें उसी दिन या अगले दिन रसीदें मिल जाती थीं। हालांकि इस दावे के समर्थन में वह कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। कार्य परिषद ने एफआईआर का लिया फैसला
विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की बैठक 22 जनवरी 2026 को हुई, जिसमें सर्वसम्मति से सुनील कुमार प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का निर्णय लिया गया। थाना नेवई पुलिस ने मामला पंजीबद्ध कर विवेचना शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा रही है और यदि अन्य लोगों की भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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