मंडी में 38 दिनों से धान की आवक नहीं, जनवरी में बोहनी तक नहीं हुई

भास्कर न्यूज | बालोद जिले के 143 केंद्रों में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की समय सीमा समाप्त होने के बावजूद जिला मुख्यालय के कृषि उपज मंडी में सन्नाटा पसरा हुआ है। मंगलवार को धान की आवक नहीं होने से वीरानी का आलम रहा। मंडी प्रबंधन का तर्क है कि समर्थन मूल्य पर धान बेचने के बाद बचे उपज को किसान वर्तमान में कोचियों के पास बेच रहें है। इसलिए यहां सन्नाटा पसरा हुआ है। नवंबर से दिसंबर तक कम किसान धान बेचने के लिए पहुंचे थे। जबकि जनवरी मंे एक भी किसान यहां धान बेचने नहीं पहुंचे। बोहनी तक नहीं हो पाई। प्रबंधन के अनुसार नवंबर माह में सिर्फ एक ही दिन 10 तारीख को 362 क्विंटल धान खरीदी हुई थी। जिसके बाद दिसंबर में 27 तारीख को 292 क्विंटल धान खरीदी हुई। जिसके बाद से अब तक 38 दिन से खरीदी नहीं हुई है। यह स्थिति तब है, जब 30 जनवरी से सोसाइटियों में समर्थन मूल्य पर खरीदी का सिलसिला समाप्त हो चुका है। पहले अनुमान लगा रहे थे कि खरीदी केंद्रों में धान बेचने के बाद किसान मंडी पहुंचेंगे लेकिन स्थिति विपरित है। छोटे व बड़े व्यापारी के पास किसान धान बेच रहें है। इस वजह से कृषि उपज मंडी में सन्नाटा पसरा हुआ है। समर्थन मूल्य की तुलना में मंडी में धान का दाम कम समर्थन मूल्य की तुलना में मंडी में धान का दाम कम है। खरीफ सीजन में सरकार से तय समर्थन मूल्य पर सोसायटियों में खरीदी होती है। इस वजह से यहां धान की आवक कम होती है। इस साल अप्रैल 2025 से लेकर जनवरी 2026 तक मंडी में 63 हजार 218 क्विंटल धान खरीदी हुई है। मंडी प्रबंधन के अनुसार नवंबर व दिसंबर मंे जब दो दिन धान खरीदी हुई थी, तब क्वालिटी अनुसार आरबी गोल्ड धान प्रति क्विंटल 2000 से 2087 रुपए, आईआर 1818 से 1987 रुपए, सरना व अन्य किस्म के धान प्रति क्विंटल 1800 से 2055 रुपए तक बिका। प्रति एकड़ खरीदी लिमिट तय होते ही आवक घटी सोसायटियों में धान बेचने के बाद उपज बचने की स्थिति में किसान मंडी पहुंच सकते है। सरकार ने जब से सोसायटियों में प्रति एकड़ 21 क्विंटल खरीदी का निर्णय लिया है, तब से मंडी मंे धान की आवक कम हो रही है। हालांकि आगे धान की आवक होने का अनुमान है क्योंकि सहकारी केंद्रों मंे खरीदी बंद हो चुकी है। प्रबंधन का तर्क है कि खरीफ सीजन में प्रति एकड़ 21 क्विंटल के हिसाब से सहकारी केंद्रों में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी होती है। ऐसे में अधिकांश किसान पूरी उपज को सहकारी केंद्र में बेचते है। जिसके चलते मंडी में आवक कम होती है।

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