सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें, मगर अपनी मानसिक सीमाएं तय रखें। तुलना से बचें, क्योंकि हर सफ़र अलग होता है। रिश्तों को कंटेंट नहीं, इंसान समझें और दबाव में मदद मांगना कमजोरी नहीं, साहस है। दूसरों की “हाइलाइट रील’ को अपनी “रियल लाइफ’ से तुलना न करें। भास्कर न्यूज| नवांशहर सोशल मीडिया पर हर दिन लाखों लोग कैमरे के सामने मुस्कुराते हैं, अपनी दिनचर्या को वीडियो और तस्वीरों में बदलते हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मुस्कान कई बार सिर्फ दिखावा होती है। फॉलोअर्स और व्यूज की दौड़ में लोग धीरे-धीरे असली जिंदगी और सच्चे रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं। तुलना की आदत, मान्यता की चाह और रिश्तों का प्रदर्शन मानसिक दबाव को बढ़ाता है। हालिया अध्ययनों और सर्वेक्षणों के अनुसार, बड़ी संख्या में युवा मानसिक तनाव, चिंता और अकेलेपन से जूझ रहे हैं। इस फीचर स्टोरी में तीन अलग-अलग घटनाओं के जरिये बताया गया है कि कैसे कंटेंट की चकाचौंध के पीछे इंसान का अंधेरा छिपा होता है। केस अलग हैं, लेकिन दर्द एक जैसा जब कंटेंट जिंदगी से ज़्यादा अहम हो जाए, तो इंसान खुद से दूर हो जाता है। केस 1 : दो भाई-बहन ने साथ में कंटेंट बनाना शुरू किया। बहन को जल्दी पहचान मिली, लेकिन भाई को तानों ने तोड़ दिया- “बहन की वजह से फेमस है’ ये तुलना घर तक पहुंच गई जो उसके अकेलेपन को गहरा करती गई। सुसाइड की कोशिश की। आज उसने सोशल मीडिया छोड़ दिया है। केस-2 : एक लड़की ने रिश्तों को व्यूज को खेल बना लिया। अलग-अलग लड़कों के साथ सोशल मीडिया पर अलग-अलग पेज बनाकर, अलग-अलग कंटेंट डालने लगी। लेकिन सच छिपा नहीं। सबको सच्चाई पता चली, तो सारे रिश्ते टूट गए। वह अकेली रह गई- न कंटेंट बचा, न लोग। केस-3: एक कपल ने बड़े इन्फ्लुएंस को देख अपनी जिंदगी से तुलना शुरू की। विदेशी ट्रिप, महंगे सरप्राइज, परफेक्ट कपल सब कॉपी करने की कोशिश। लेकिन हकीकत और कंटेंट के बीच फासला बढ़ा तो रिश्ते में तनाव आ गया। गुस्से, दबाव में लड़की ने खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। डॉ. राज शास्त्री, साइकोलोजिस्ट, जिला अस्पताल, नवांशहर दूसरों की रील को रियल से तुलना करने लगते हैं, तो रिश्तों में असंतोष और मानसिक दबाव बढ़ता है। यह स्थिति व्यक्ति को भावनात्मक रूप से खाली कर देती है।


