सुबह के ठीक 7.30 बजे हैं। जेल की ऊंची दीवारों और लोहे की सलाखों के बीच सन्नाटा टूटता है। लेकिन किसी हंगामे से नहीं, गीता के श्लोकों कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.. से। ऑनलाइन स्क्रीन के सामने बैठे 11 बंदी एक-एक श्लोक दोहराते हैं। ये वही लोग हैं, जिनकी जिंदगी किसी मोड़ पर भटक गई थी। अब वही लोग अपने भीतर झांकने की कोशिश कर रहे हैं, वो भी भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों के सहारे। जिला जेल कबीरधाम में शुरू हुआ यह गीता अध्ययन कार्यक्रम महज धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि मानव सुधार की एक संवेदनशील पहल है। 3 फरवरी से शुरू हुए इस कार्यक्रम का उद्देश्य बंदियों को सजा के साथ-साथ संवेदना और आत्मबोध देना है। गीता परिवार से जुड़ीं वर्षा वर्मा, नितिन गोरे और साई काव्या रोज सुबह बंदियों को गीता के श्लोकों का अर्थ आसान भाषा में समझा रहे हैं। कर्म क्या है, जिम्मेदारी क्या है और गलती के बाद जीवन कैसे आगे बढ़ता है। यह बंदियों को बताया जा रहा है। पहली बार लगा कोई हमें इंसान समझ रहा है.. एक बंदी (नाम गोपनीय) भावुक होकर कहता है कि जेल में हर दिन एक जैसा होता है। लेकिन गीता पढ़ने के बाद पहली बार लगा कि कोई हमें सिर्फ अपराधी नहीं, इंसान भी समझ रहा है। वह आगे कहता है कि श्लोक सुनकर एहसास होता है कि गलती के बाद भी सुधार संभव है। सहायक जेल अधीक्षक राजेंद्र बंजारे बताते हैं कि यह कार्यक्रम 3 महीने तक चलेगा। इसमें गीता के सभी 18 अध्यायों का अध्ययन कराया जाएगा। उनका मानना है कि गीता बंदियों में धैर्य, आत्मसंयम और मानसिक शांति विकसित करेगी, जो अक्सर जेल जीवन में सबसे ज्यादा टूटते हैं।


