राजस्थान में ऊंट की खाल से बनने वाली कुप्पी कभी रोजमर्रा की जरूरत और शिल्प परंपरा, दोनों का हिस्सा थी। तेल और इत्र को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल होने वाली यह बोतल बाद में उस्ता कला की आधार संरचना बनी। लेकिन यह कला पूरी तरह उस कच्चे माल पर निर्भर है, जो अब बेहद दुर्लभ हो चुका है और वो है ऊंट की खाल। कभी-कभार ही खाल मिल पाती है। खाल नहीं मिलती, तो काम अपने आप रुक जाता है। पूरे राजस्थान में अब मुश्किल से दो-तीन कारीगर ही बचे हैं, जो इस कला को जानते हैं। कुप्पी पर ही होती है उस्ता कला, उस्ता ने ही कुप्पी बनाने वालों को विलुप्त होने से बचा रखा है बीकानेर के पारंपरिक कारीगर राजकुमार पवार (डबगर) बताते हैं- अब कुप्पी बनाना लगभग बंद हो चुका है। 10 सालों में मैंने किसी सामान्य ग्राहक को कुप्पी नहीं बेची। उस्ता कला के कारीगरों के लिए ही बना रहा हूं क्योंकि उस्ता कला का आधार यही कुप्पी है। आम खरीदार न तो इसकी कीमत समझता है और न ही इसका उपयोग। कुप्पी बनाने की प्रक्रिया लंबी और मौसम पर निर्भर होती है। पहले मंडी से ऊंट की खाल ली जाती है, जिसे पहले से साफ किया गया होता है। इसके बाद खाल को सही आकार में काटा जाता है और कई दिनों तक सुखाया जाता है। इसी दौरान मिट्टी से डाई बनाई जाती है। खास बात यह है कि हर कुप्पी के लिए अलग डाई बनती है। अगर दस कुप्पी बनानी हैं तो दस अलग-अलग डाई तैयार करनी पड़ती हैं। डाई बनाने के बाद सूखी हुई खाल को मथी हुई मेथीदाना के साथ डाई पर चिपकाया जाता है। सूखने के बाद खाल को दोबारा साफ किया जाता है, जिससे परत पर नक्काशी हो सके। किसी भी एक ऑर्डर को पूरा करने में 15 से 30 दिन तक का समय लग जाता है, वह भी तब जब खाल समय पर मिल जाए। राजकुमार पवार कहते हैं कि उनके परिवार में अब कोई भी इस काम को आगे नहीं बढ़ाना चाहता। कीमत 700 से 4000 रुपए तक होने के बावजूद मेहनत के मुकाबले आमदनी बेहद कम है। ऊपर से लोग यह भी नहीं जानते कि कुप्पी होती क्या है। वे कहते हैं कि दुख इस बात का है कि जो काम उनके दादा और पिता ने पूरी ज़िंदगी किया, वह अब उनके साथ ही खत्म हो जाएगा।


