लुधियाना में अवैध खनन के खिलाफ ग्रामीणों का पहरा:नदी से रेत की चोरी, बाढ़ का खतरा. आर-पार की लड़ाई का ऐलान

पंजाब के लुधियाना में जगराओं के गांव खैहरा बेट में अवैध रेत खनन के खिलाफ ग्रामीणों का रोष चरम पर है। धरने के दूसरे दिन भी ग्रामीण सतलुज दरिया के किनारे डटे रहे और इस लड़ाई को निर्णायक बताया। आंदोलन को लंबा खींचने के इरादे से ग्रामीणों ने वहां स्थायी टेंट लगा लिया है और रात भर भोजन, पानी व पहरे का पुख्ता इंतजाम किया गया। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी जान की बाजी लगा देंगे, लेकिन दरिया के सीने को छलनी नहीं होने देंगे। इस संघर्ष का नेतृत्व कर रहे एडवोकेट पार्षद रविंदरपाल सिंह और सरपंच हरदीप सिंह लक्की ने प्रशासन और सरकार पर रेत माफिया के साथ मिलीभगत का गंभीर आरोप लगाया। नेताओं का कहना है कि डीसी लुधियाना और पुलिस के उच्च अधिकारियों को पोकलेन मशीनों द्वारा किए जा रहे अवैध खनन की जानकारी दी गई, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों के अनुसार, सरकार दरिया की सफाई के नाम पर माफिया को खुली छूट दे रही है, जबकि इस रेत का उपयोग बांधों को मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए।
25 गांवों में बाढ़ का खतरा ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अंधाधुंध खनन के कारण आसपास के करीब 25 गांवों पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। बारिश या जलस्तर बढ़ने की स्थिति में यह इलाका पूरी तरह असुरक्षित हो जाएगा, लेकिन सरकार जन-सुरक्षा के प्रति पूरी तरह उदासीन बनी हुई है। ग्रामीणों का तर्क है कि यदि वास्तव में दरिया की सफाई ही उद्देश्य है, तो निकाली गई रेत का इस्तेमाल गांवों को बाढ़ से बचाने वाले बांधों को पुख्ता करने के लिए किया जाना चाहिए, न कि इसे अवैध रूप से बेचा जाए। पहरे के लिए 20 लोगों की टोली बनाई प्रशासनिक निष्क्रियता को देखते हुए गांव के युवाओं ने स्वयं मोर्चा संभाल लिया है। रात के समय खनन रोकने के लिए युवाओं की 20-20 सदस्यों वाली टीमें बनाई गई हैं, जो चार-चार घंटे की शिफ्ट में दरिया किनारे आग जलाकर पहरा दे रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह अब महज एक धरना नहीं, बल्कि सरकारी नाकामी और माफिया राज के खिलाफ एक जन-विद्रोह का रूप ले चुका है, जो तब तक जारी रहेगा जब तक खनन पूरी तरह बंद नहीं हो जाता।

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