आशीष वाजपेयी | बांसवाड़ा सूर्यास्त से पहले बारात पहुंच जाती है, बाराती रात को विश्राम करते हैं, सुबह सभी जल्दी उठते हैं, सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में फेरे संपन्न करा लिए जाते हैं और उसके बाद भोजन करके दोपहर तक बारात विदा ले लेती है। बदलते दौर में यह बात आश्चर्यजनक भले ही लगे लेकिन वागड़-कांठल में घाटोल सहित कुछ क्षेत्रों में जनजाति समाजों में आज भी यह परम्परा कायम है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में शादी की रस्में कुछ घंटे आगे खिसकी हैं लेकिन अब भी सभी रस्में पूरी कर बारात को दोपहर तक विदा कर देने की परम्परा है। उद्यानिकी विभाग के उपनिदेशक दलसिंह गरासिया बताते हैं, मेरी शादी थी तब बारात घामनिया हमीरा से दोपहर को रवाना हुई और सूर्यास्त से पहले सज्जनगढ़ पहुंच गई। रात को विश्राम के बाद हम सभी तड़के दो-ढाई बजे उठे और तैयारियों में लग गए। सूर्योदय से पहले फेरों आदि की रस्में पूरी कर ली गई। दोपहर होने से पहले भोजन कर हम वापस रवाना हुए और शाम तक घामनिया हमीरा पहुंच गए थे। अब कुछ ही क्षेत्रों में यह परम्परा कायम है, बाकी जगह ट्रेंड बदला है। वाल्मीकि समाज सुधार संस्था के जिलाध्यक्ष फूलगिरी महाराज बताते हैं, अब लोग सामर्थ्य के अनुरूप सुविधा और भव्यता के आधार पर शादियां करने लगे हैं। लेकिन घाटोल आदि क्षेत्रों में आज भी बारात सूर्यास्त से पहले आती है और सुबह अधिकतम 8 बजे तक फेरों की रस्म पूरी हो जाती है। इसके बाद अन्य रस्में होती हैं और बारात को विदा कर दिया जाता है। घोटिया आंबा महंत रामगिरि महाराज बताते हैं, ब्रह्म मूहुर्त का बहुत महत्व है इसलिए उसी मुहूर्त में फेरे कराने का रिवाज था। मान्यता रही है कि इससे परिवार-समाज में सकारात्मक ऊर्जा और पवित्रता रहती है। अब शादियां शाम को और रात को होने लगी हैं, इससे व्यसन बढ़ रहे हैं। घाटोल जैसे क्षेत्रों में भी सामर्थ्यवान लोग कम नहीं हैं लेकिन वहां ज्यादातर परिवारों में पुराने रीति-रिवाजों का पालन किया जा रहा है।


