राजस्थान की 1.06 लाख स्कूलों में से 14,028 में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट नहीं हैं। इनमें करीब 9 हजार सरकारी और 5,000 निजी या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि वर्ष 2015-16 में प्रदेश के 97 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए उपयोग योग्य टॉयलेट थे, जो 2024-25 में घटकर 87 प्रतिशत रह गए। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही दिए फैसले में मासिक धर्म स्वच्छता और उपयोग लायक टॉयलेट को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है। कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग और काम के टॉयलेट हों और इसके लिए तीन माह का समय दिया है। सवाल – क्या राज्य सरकार तय समय में हर स्कूल में यह सुविधा उपलब्ध करा पाएगी। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की यूडीआईएसई प्लस रिपोर्ट के अनुसार देश में 94 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट हैं। इस तरह राजस्थान राष्ट्रीय औसत से पीछे है और देश के 36 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में 29वें स्थान पर है। प्रदेश उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से भी पीछे है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी के फैसले में ‘मासिक धर्म स्वच्छता’ को जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा बताया है। कोर्ट ने कहा-खराब टॉयलेट लड़कियों की गरिमा, निजता और शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है। नियमों का पालन न करने पर स्कूलों की मान्यता रद्द हो सकती है। भास्कर एक्सपर्ट- स्कूल में सुविधाओं का बजट ज्यादा मिले स्कूल में लड़कियों के लिए साफ-सुथरे उपयोग लायक टॉयलेट होने चाहिए। सुविधा नहीं होने से छात्राओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और मानसिक स्थिति पर असर पड़ता है। पीरियड के दिनों में कई लड़कियां स्कूल जाना छोड़ देती हैं, जिससे ड्रॉपआउट बढ़ता है। अस्वच्छ टॉयलेट से संक्रमण का खतरा रहता है। सुरक्षित और स्वच्छ सुविधा मिलने पर आत्मविश्वास और पढ़ाई दोनों बेहतर होते हैं। राज्य स्वास्थ्य विभाग के सर्वे के अनुसार 0.9% विद्यालय आधारित रोग मामलों का कारण अपर्याप्त स्वच्छता है। इसलिए बजट में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं के लिए आवंटन बढ़ाना चाहिए।


