दो साल पहले जब मैं दौसा से जयपुर आया था, तब सोचा था कि डिलीवरी की नौकरी कुछ समय के लिए ही करूंगा, लेकिन अब दो साल हो चुके। सुबह 6 बजे स्टोर पहुंचना होता है। 5-10 मिनट की देरी से ऑर्डर पीछे खिसक जाते हैं। काम खत्म होते-होते रात के 11 बज जाते हैं। 17 घंटे सड़क पर रहने के बाद शरीर ही नहीं, दिमाग भी सुन्न हो जाता है।
दिन में 50-60 ऑर्डर करने पर 1000-1200 रुपए मिलते हैं। भुगतान किमी के हिसाब से होता है, पेट्रोल हमारा होता है। बाइक खराब हो जाए तो भी ऑर्डर कैंसल नहीं कर सकते। हाल ही में बारिश में बाइक बंद हो गई थी, दोस्त की मदद से डिलीवरी पूरी की। हर दिन 70 डिलीवरी का टारगेट हैं। कई बार रात के 2 बज जाते हैं। 70 ऑर्डर पर 740 और 60 पर 530 रुपए इंसेंटिव मिलता है। एक के बाद एक डिलीवरी होती है। इंस्टेंट डिलीवरी के समय हमारी जिंदगी एप के हिसाब से चलती है। पिछले 4 महीने से दिन में खाना तक नहीं खा पाता, सिर्फ रात में खाना और दिन में एक चाय। कस्टमर की शिकायत पर आईडी बंद हो जाती है। कोई सामान खो जाए या सीओडी में पैसे न मिलें तो नुकसान हमारी जेब से होता है। अब तक 3 रोड एक्सीडेंट हो चुके हैं। नियम के अनुसार एक्सीडेंट पर 500 रुपए रोज मिलते हैं, लेकिन मैनेजर का मेल नहीं जाने से भुगतान नहीं मिलता। कहने को हम डिलीवरी बॉय हैं, लेकिन असल में हम टाइम, ट्रैफिक, मौसम और सिस्टम के बीच फंसे लोग हैं, जो हर ऑर्डर के साथ बस अगला दिन निकालने की कोशिश करते हैं।
-जैसा ईशा सिंह को बताया


