राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस जांच की स्वतंत्रता और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को लेकर एक अहम व्यवस्था दी है। जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के तहत मजिस्ट्रेट या उच्च अदालत पुलिस को किसी मामले में ‘पुनः जांच’ या ‘अग्रिम जांच’ के निर्देश देने का अधिकार तो रखते हैं, लेकिन वे जांच अधिकारी को यह निर्देश नहीं दे सकते कि जांच किस तरह से की जाए या कौन से साक्ष्य किस माध्यम से जुटाए जाएं। मामला: चेक पर हस्ताक्षरों की एफएसएल जांच का विवाद यह कानूनी विवाद चित्तौड़गढ़ जिले के कोतवाली थाने में वर्ष 2024 को दर्ज एक एफआईआर से शुरू हुआ था। इस मामले में पुलिस ने जांच के बाद एफआर पेश कर दी थी। शिकायतकर्ता अजयराज सिंह ने इस एफआर के खिलाफ सीजेएम चित्तौड़गढ़ की कोर्ट में प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की। सीजेएम कोर्ट ने 2 अप्रैल 2025 को आदेश जारी करते हुए पुलिस को मामले की अग्रिम जांच करने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने अपने आदेश में एक विशिष्ट निर्देश यह भी जोड़ दिया कि पुलिस विवादित चेक और हैंड नोट पर मौजूद हस्ताक्षरों की जांच एफएसएल से करवाए। इसी आदेश को जिला एवं सत्र न्यायालय ने भी बरकरार रखा, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता महावीर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट में वकीलों के तर्क: जांच की स्वायत्तता बनाम न्यायिक नियंत्रण याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि निचली अदालतों ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। उन्होंने दलील दी कि कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, मजिस्ट्रेट पुलिस को जांच का निर्देश दे सकता है, लेकिन वह जांच अधिकारी की भूमिका खुद नहीं निभा सकता। मजिस्ट्रेट यह तय नहीं कर सकता कि साक्ष्य जुटाने के लिए कौन सा तरीका अपनाया जाना चाहिए। शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि निष्पक्ष न्याय के लिए एफएसएल जांच जरूरी थी। उन्होंने दलील दी कि यदि पुलिस ने अपनी प्रारंभिक जांच में लापरवाही बरती है, तो मजिस्ट्रेट के पास न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशिष्ट निर्देश देने की शक्ति निहित है। हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या जस्टिस संदीप शाह ने अपने विस्तृत फैसले में जांच एजेंसी की स्वायत्तता और अदालत की शक्तियों के बीच की रेखा को स्पष्ट किया। कोर्ट ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रेखांकित किए: जांच का विशेष अधिकार क्षेत्र: कोर्ट ने कहा कि किसी अपराध की जांच करना पुलिस का विशेष विशेषाधिकार है। यह कार्यपालिका का कार्य है और इसमें न्यायपालिका तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती जब तक कि जांच में कोई स्पष्ट अवैधता न हो। कैसे बनाम क्या: कोर्ट ने व्यवस्था दी कि मजिस्ट्रेट पुलिस को ‘क्या’ करना है (यानी जांच करनी है) यह बता सकता है, लेकिन ‘कैसे’ करना है (यानी साक्ष्य कैसे इकट्ठा करने हैं) यह नहीं बता सकता। साक्ष्य के संग्रह का तरीका तय करना पूरी तरह से जांच अधिकारी के विवेक पर निर्भर है। ट्रायल की निष्पक्षता: कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि अदालत पहले ही यह तय कर दे कि कौन सा साक्ष्य (जैसे एफएसएल रिपोर्ट) लेना है, तो वह एक तरह से मामले के भविष्य का फैसला पहले ही कर देती है, जो एक निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने पूर्व के कई महत्वपूर्ण फैसलों और कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए निचली अदालतों के आदेशों को आंशिक रूप से रद्द कर दिया। कोर्ट ने सीजेएम चित्तौड़गढ़ और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संख्या-2 के उन निर्देशों को हटा दिया, जिनमें पुलिस को विशेष रूप से हस्ताक्षरों का मिलान एफएसएल से कराने के लिए कहा गया था। जस्टिस शाह ने आदेश दिया कि पुलिस इस मामले में ‘अग्रिम जांच’ जारी रखेगी, लेकिन यह जांच पूरी तरह से स्वतंत्र होगी। जांच एजेंसी कानून के दायरे में रहकर अपनी मर्जी और पेशेवर तरीके से साक्ष्य जुटाने के लिए स्वतंत्र है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी बिना किसी न्यायिक दबाव के निष्पक्षता से अपनी रिपोर्ट पेश करे।


